अमरिया विकासखंड में भेदभाव के आरोप: क्या समानता का अधिकार कागज़ों तक सीमित?
जनपद पीलीभीत के विकासखंड अमरिया की कई ग्राम पंचायतों में ग्राम विकास अधिकारियों और कुछ प्रधानों पर कथित तौर पर भेदभावपूर्ण तरीके से भुगतान (पेमेंट) करने के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि त्योहारों और सार्वजनिक कार्यों से जुड़े भुगतान में पारदर्शिता नहीं बरती जा रही और धर्म या पक्षपात के आधार पर निर्णय लिए जा रहे हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि प्रधान एक समुदाय से है तो उसी समुदाय के त्योहारों से जुड़े कार्यों पर प्राथमिकता से भुगतान किया जाता है, जबकि दूसरे समुदाय के मामलों में अनदेखी होती है। इससे पंचायत स्तर पर असंतोष और अविश्वास का माहौल बन रहा है। लोगों का सवाल है—क्या ग्राम विकास अधिकारी जनता के सेवक हैं या किसी विशेष पक्ष के प्रतिनिधि?
भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। ऐसे में यदि पंचायत स्तर पर किसी भी प्रकार का धार्मिक या जातिगत भेदभाव होता है, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही बल्कि संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ भी माना जाएगा। ग्रामीण पूछ रहे हैं—क्या समानता का अधिकार सिर्फ किताबों तक सीमित है?
अमरिया विकासखंड की विभिन्न ग्राम पंचायतों में उठ रहे इन आरोपों को लेकर अब उच्चाधिकारियों से निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित प्रधानों और ग्राम विकास अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की विभाजनकारी प्रवृत्ति पर रोक लग सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायत स्तर पर सभी भुगतान और कार्यों का विवरण सार्वजनिक पोर्टल और सूचना पट्ट पर अनिवार्य रूप से प्रदर्शित किया जाए, ताकि किसी भी तरह के भेदभाव या पक्षपात की आशंका खत्म हो सके। अब बड़ा सवाल यह है—क्या प्रशासन इस मामले में सख्त कदम उठाएगा या फिर आम जनता यूं ही हिंदू-मुस्लिम के भेद में पिसती रहेगी? सरकार और संबंधित विभागों को स्पष्ट जवाब देना होगा, क्योंकि लोकतंत्र में जवाबदेही ही विश्वास की नींव है।
राजकुमार वर्मा
अबतक न्याय पीलीभीत

