करवा चौथ का इंतजार हर विवाहित महिला को रहता है. 10 अक्तूबर को ये पर्व मनाया जाएगा. ये पर्व सिर्फ एक धार्मिक निर्जला व्रत नहीं है, बल्कि दांपत्य प्रेम, त्याग और अटूट विश्वास का एक भव्य उत्सव है. सुहागिन स्त्रियां इस दिन अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व का नाम "करवा चौथ" ही क्यों पड़ा? और इस परंपरा के मूल में छिपा, करवा आखिर क्या होता है?
इस व्रत में पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है करवा यानी मिट्टी का पात्र. इसमें मिट्टी का करवा यानी घड़ा/बर्तन प्रयोग करने का विशेष महत्व होता है. इसके बिना व्रती की पूजा अधूरी मानी जाती है. आचार्य परम स्वरूप शर्मा बताते हैं कि \करवा शब्द का अर्थ है मिट्टी का घड़ा, जो इस व्रत की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण होता है. पहले के समय में काली मिट्टी को गूंथा जाता था और उसी से करवा तैयार किया जाता था. हालांकि, अब यह आसानी से बाजारों में उपलब्ध है. करवा का अर्थ मिट्टी के पात्र से है और चौथ का मतलब चतुर्थी तिथि से है. सनातन धर्म में करवा पांच तत्वों – जल, मिट्टी, अग्नि, आकाश और वायु का प्रतीक माना जाता है. क्योंकि करवा को बनाने में भी मिट्टी, पानी, आग, वायु और धूप का इस्तेमाल होता है. यही वजह है कि दांपत्य जीवन को खुशहाल और संतुलित बनाए रखने के लिए मिट्टी के करवे का इस्तेमाल किया जाता है. यही कारण है कि करवा चौथ का नाम भी मिट्टी के पात्र करवा से ही पढ़ा.
सास-बहू की परंपरा
करवा चौथ के दिन सास और बहू के बीच करवा का आदान-प्रदान एक विशेष परंपरा है, जब बहू व्रत शुरू करती है, तो सास उसे करवा देती है. वहीं, बहू भी पूजा के दौरान एक करवा सास को देती है, जो उनके बीच प्रेम और आशीर्वाद के बंधन को दर्शाता है. अगर किसी महिला की सास न हो तो ननद, जेठानी या घर की कोई दूसरी सुहागिन महिला व्रती को करवा दे सकती है. पूजा के लिए दो करवे लिए जाते हैं. एक करवे में शुद्ध जल डाला जाता है. दूसरे में सफेद चावल, फूल, मौसमी फल और मिठाई रखी जाती है.
व्रत के दिन भूलकर भी न करें ये गलतियां
व्रत के दिन व्रती महिला को कुछ गलतियों से बचना चाहिए, ताकि व्रत में कोई विघ्न न पड़े. इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. पंडित मुक्ति चक्रवर्ती के अनुसार, व्रत की शुद्धता और पूर्ण फल प्राप्ति के लिए कुछ गलतियों से बचना चाहिए, जैसे:
- जल या भोजन न करें: चांद निकलने से पहले जल या भोजन ग्रहण न करें, अन्यथा व्रत अधूरा माना जाता है.
- वस्त्रों का चुनाव: काले या सफेद कपड़े न पहनें, क्योंकि लाल या सुहाग के रंग शुभ माने जाते हैं.
- वाणी और विचार: गुस्सा, कटु वचन या नकारात्मक सोच से बचें, क्योंकि यह दिन मानसिक शुद्धता का प्रतीक है. किसी की निंदा या झूठ न बोलें, इससे व्रत का पुण्य कम होता है.
- करवा की दिशा: पूजा के समय करवा उल्टा न रखें, इसे अशुभ माना गया है.व्रत खोलने की सही विधि और नियम
करवा चौथ के व्रत को सही विधि विधान से करना जितना जरूरी है उतने ही विधि विधान से इस व्रत को खोलना चाहिए, ताकि व्रती को इस व्रत का शुभ फल प्राप्त हो सके. इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. आचार्य परम स्वरूप के अनुसार कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे:
- चंद्रमा को अर्घ्य: रात में चंद्रोदय के बाद, व्रती पहले चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं. अर्घ्य देने के लिए तांबे या पीतल के पात्र में जल में दूध, रोली, चावल और चीनी मिलाई जाती है. चंद्रमा को अर्घ्य देना शादीशुदा जीवन में सुख-शांति का आशीर्वाद मांगना है.
- व्रत का समापन: इसके बाद पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर और फिर मिठाई खिलाकर व्रत खुलवाते हैं. ये क्रिया पति-पत्नी के बीच के गहरे सम्मान और भावनात्मक बंधन को दर्शाती है.
- व्रत खोलने के बाद भारी या तले हुए भोजन से बचना चाहिए. पहले पानी पीकर और मीठा खाकर, हल्का और सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए.
अविवाहित कन्याओं के लिए व्रत के नियम
कुछ लोगों के मन में ये सवाल रहता है कि सिर्फ विवाहित महिलाएं ही इस व्रत को रख सकती हैं या कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को रख सकती हैं या नहीं. पंडित मुक्ति चक्रवर्ती का कहना है कि ये व्रत सौभाग्य और अच्छे वर की कामना से जुड़ा है, इसलिए कई कुंवारी कन्याएं भी इसे रखती हैं.
व्रत का स्वरूप: अविवाहित कन्याएं आमतौर पर निर्जला (बिना पानी) व्रत की जगह जल पीकर यह व्रत रख सकती हैं.
पारण का नियम: वे चंद्रमा की जगह तारों को देखकर अपना व्रत खोल सकती हैं. यह व्रत उन्हें उत्तम जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देता है.
