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Home गौमाता के नाम पर राजनीति, पर पेट खाली क्यों?

गौमाता के नाम पर राजनीति, पर पेट खाली क्यों?

John Doe by Rajesh Kumar Siddharth
Posted: Nov 4, 2025 01:42 PM
in न्यूज़, देश, राज्य, उत्तर प्रदेश, अपराध, क्राइम न्यूज, गांव की हकीकत, गौशाला की हकीकत, धरना, चर्चा
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गौशालाओं में पशुओं की मौत भूख से क्यों हो रही है?”

(गांव की गौशालाओं की सच्चाई, प्रशासनिक लापरवाही और मानवीय संवेदना के पतन पर एक विस्तृत संपादकीय विश्लेषण)

 गौमाता के नाम पर राजनीति, पर पेट खाली क्यों?

भारत में गाय को “मां” का दर्जा दिया गया है।
गांव की संस्कृति, कृषि और अर्थव्यवस्था का आधार गाय रही है।
पर विडंबना यह है कि आज वही गाय, जिसे पूजनीय माना जाता है,
सरकारी गौशालाओं में भूख और बीमारी से तड़प-तड़पकर मर रही है।

हर वर्ष देशभर से ऐसी खबरें आती हैं —
“गौशाला में सैकड़ों गायों की मौत,”
“चारागाह खाली, पर फाइलों में चारा खर्च पूरा,”
“गोबर की बदबू में दम तोड़ते निरीह पशु।”

प्रश्न यह है कि –
जब सरकारें करोड़ों रुपये गौ संरक्षण पर खर्च करने का दावा करती हैं,
तो आखिर गौशालाओं में गायें भूखी क्यों मर रही हैं?
यह सवाल सिर्फ प्रशासन से नहीं, बल्कि पूरे समाज से जवाब मांगता है।

1. गाय — भारतीय संस्कृति और गांव की आत्मा

गांव का जीवन गाय के बिना अधूरा है।
खेती के लिए बैल, ईंधन के लिए गोबर, और दूध के लिए गाय —
यह त्रिकोण ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
गाय को “धन” कहा गया क्योंकि यह सिर्फ दूध नहीं,
बल्कि कृषि, पर्यावरण और जीवनयापन का केंद्र रही है।

लेकिन जब वही गाय सड़क पर भटकती, कचरे में मुंह डालती या गौशाला में मरती दिखती है,
तो यह हमारी संस्कृति की आत्मा पर प्रश्नचिह्न है।

2. गौशालाएं — संरक्षण का नाम, उपेक्षा का स्थान

सरकारों ने गायों के संरक्षण के नाम पर हजारों गौशालाओं की स्थापना की।
कागजों पर हर गौशाला में चारा, पानी, चिकित्सा और देखभाल की पूरी व्यवस्था दर्ज है।
परंतु वास्तविकता यह है कि अधिकांश गौशालाएं कागजी स्वर्ग, ज़मीनी नरक बन गई हैं।

कई जगह शेड टूटे हुए हैं।

चारे का नाम पर केवल सूखी घास है।

पानी की टंकी महीनों से खाली पड़ी है।

डॉक्टर कभी-कभार ही आते हैं।

और कई बार तो मृत गायों के शव खुले में सड़ते हैं।

यह स्थिति बताती है कि “गौ सेवा” अब धंधा बन गई है,
जहां धर्म और राजनीति दोनों की आड़ में प्रशासनिक भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है।

3. गौशालाओं का बजट और फंड का खेल

हर साल केंद्र और राज्य सरकारें करोड़ों रुपये “गौ सेवा” के नाम पर जारी करती हैं।
उदाहरण के लिए, कई राज्यों में गौशाला अनुदान योजना के तहत प्रति पशु प्रतिदिन ₹30 से ₹100 तक की राशि तय है।
लेकिन सवाल यह है कि —
अगर पैसा आ रहा है तो गाय भूखी क्यों मर रही है?

उत्तर सीधा है —
यह पैसा गाय तक नहीं पहुंचता।

फंड रिलीज़ होता है, पर उसका बड़ा हिस्सा मध्यस्थों, ठेकेदारों, भ्रष्ट अधिकारियों और गौशाला प्रबंधकों की जेब में चला जाता है।
कागजों में चारा खरीदा दिखाया जाता है, लेकिन मैदान में केवल धूल है।
फर्जी बिल, मनगढ़ंत राशन पर्चियां, और मृत गायों की फर्जी गणना —
यही है आज की कई “गौशालाओं” की असलियत।

4. प्रशासनिक लापरवाही और निरीक्षण की विफलता

गौशालाओं की जिम्मेदारी पशुपालन विभाग की होती है।
लेकिन निरीक्षण और निगरानी की व्यवस्था पूरी तरह ढह चुकी है।
कई जिलों में महीनों तक कोई अधिकारी दौरा नहीं करता।
कभी जांच होती भी है तो सूचना पहले ही दे दी जाती है —
ताकि गायों को अस्थायी रूप से “सजाया” जा सके।

मृत गायों की रिपोर्ट दबा दी जाती है,
और उच्चाधिकारियों तक “सब ठीक है” की फाइल पहुंचा दी जाती है।
यह प्रशासनिक अपराध है, जो धीरे-धीरे
गौशालाओं को मौत के मैदानों में बदल रहा है।

5. भूख और बीमारी — दोहरी मार

गौशालाओं में गायों की मौत के दो मुख्य कारण हैं —
भूख और संक्रमण।

जब लगातार पोषण नहीं मिलता, तो गायें कमजोर होकर
एफ़ेमिनेशन (भुखमरी) का शिकार होती हैं।
सूखे भूसे और प्लास्टिक तक खाने को मजबूर पशु
धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं।

साफ-सफाई न होने के कारण
गले की सूजन, खुर-पका, खासी, डायरिया और फेफड़ों के संक्रमण जैसी बीमारियां फैलती हैं।
और जब इलाज नहीं मिलता, तो एक के बाद एक मौतें शुरू हो जाती हैं।

यह न केवल लापरवाही है, बल्कि पशु-क्रूरता का गंभीर अपराध भी है।

6. धर्म और राजनीति की ढाल

गाय के नाम पर राजनीति भारत में पुरानी परंपरा है।
हर चुनाव में “गौमाता” को मुद्दा बनाया जाता है,
लेकिन चुनाव बीतते ही वही गायें गड्ढों में दफन कर दी जाती हैं।

गौशालाओं का संचालन कई बार धार्मिक संस्थाओं या ट्रस्टों को सौंपा जाता है।
परंतु इनमें से कई संस्थाएं वास्तव में फंड हड़पने के अड्डे बन गई हैं।
धार्मिक भावनाओं की आड़ में
वे जनता और सरकार दोनों से चंदा लेते हैं,
मगर जमीन पर गायें तड़पती हैं।

यह आस्था का नहीं, अवसरवाद का खेल है —
जहां “गौ सेवा” केवल पोस्टर तक सीमित रह गई है।

7. किसानों पर बोझ और आवारा पशुओं की समस्या

गौशालाओं की विफलता का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ता है।
जो गायें छोड़ी जाती हैं, वे सड़कों और खेतों में घूमती हैं।
फसलें चौपट करती हैं, और किसान रात-रात भर पहरा देते हैं।
अनेक किसानों ने आत्महत्या की वजह “आवारा पशु” बताई है।

सरकारें कहती हैं कि “आवारा पशुओं को गौशालाओं में रखा जाएगा”,
पर जब गौशालाएं खुद भूखी हैं, तो वे नए पशु कैसे संभालेंगी?
यह एक भयावह चक्र बन चुका है —
जहां न किसान को राहत है, न गाय को जीवन।

8. समाधान की दिशा — व्यवस्था, जवाबदेही और करुणा

इस स्थिति से निकलने का रास्ता केवल नारा नहीं, ठोस कदमों में है।
यहां कुछ आवश्यक उपाय दिए जा रहे हैं:

गौशालाओं का स्वतंत्र ऑडिट हर छह महीने में हो।

प्रत्येक गौशाला में सीसीटीवी निगरानी और लाइव डेटा सार्वजनिक पोर्टल पर हो।

चारा और चिकित्सा आपूर्ति का डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए।

स्थानीय पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों को गौशालाओं की देखरेख का जिम्मा दिया जाए।

मृत गायों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अनिवार्य हो ताकि कारण स्पष्ट हो सके।

गौशाला प्रबंधन में लापरवाही पाए जाने पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों।

पशु चिकित्सकों की स्थायी नियुक्ति की जाए और उनके लिए मोबाइल वैन सेवा हो।

धार्मिक ट्रस्टों को मिलने वाले अनुदान की पारदर्शी जांच हो।

9. समाज की संवेदना का सवाल

गाय केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं —
वह समाज की भी जिम्मेदारी है।
जब गांव में कोई गाय भूखी मरती है,
तो यह सिर्फ प्रशासन की नहीं,
बल्कि हम सबकी संवेदना की मृत्यु होती है।

गांव के लोग अगर मिलकर हर दिन थोड़ा चारा दें,
तो कोई गाय भूखी नहीं मरेगी।
गौशाला सामुदायिक सहयोग का केंद्र बन सकती है,
अगर उसे राजनीति से ऊपर रखा जाए।

10. निष्कर्ष : गौ सेवा या गौ उपेक्षा?

आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि
“गौ सेवा” के नाम पर गौ उपेक्षा की कहानियां लिखी जा रही हैं।
जिन्हें “मां” कहा गया,
वे सरकारी आंकड़ों में “मृत पशु” बनकर रह गई हैं।

जरूरत है संवेदना को नारे से बाहर लाने की।
गौशाला केवल चंदे का केंद्र नहीं,
बल्कि जीव के अधिकार और करुणा का प्रतीक होनी चाहिए।

अगर हम सच में “गौमाता” कहते हैं,
तो यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि
कोई भी गाय भूख से न मरे।

अंतिम विचार :

“गौशालाएं तब तक जीवित नहीं होंगी जब तक उनमें केवल दीवारें नहीं, दिल भी शामिल हों।”

“गाय की रक्षा केवल कानून से नहीं, करुणा से होगी।”

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DR
DP

Rajesh Kumar Siddharth

He is editor-in-chief at Bahujan Sangathak, Hindi dainik newspaper published from Lucknow, Uttar Pradesh (India)

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