अतर्रा के तुर्रा गाँव में बुज़ुर्ग किसान का आमरण अनशन
स्टे के बावजूद अवैध निर्माण का आरोप, प्रशासन की भूमिका पर सवाल**
अतर्रा (बांदा)। अतर्रा तहसील के तुर्रा गाँव में जमीन विवाद को लेकर एक बुज़ुर्ग किसान आमरण अनशन पर बैठ गया है। 70 वर्षीय गोरेलाल त्रिपाठी 13 नवंबर से अतर्रा स्थित ऐतिहासिक अशोक लाट पर धरने पर बैठे हैं। किसान का आरोप है कि जिस भूमि पर सिविल कोर्ट का स्टे लागू है और जिसका मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है, उसी पर दबंगों द्वारा अवैध निर्माण कराया जा रहा है।
सबसे गंभीर आरोप तहसील प्रशासन पर लगाए गए हैं। किसान का कहना है कि एसडीएम अतर्रा राहुल द्विवेदी, क्षेत्र के कानूनगो और लेखपाल ने अदालत के आदेश को दरकिनार कर विवादित स्थली पर हो रहे निर्माण को रोकने की कोई कार्रवाई नहीं की।
डीएम के आदेश भी बेअसर
गोरेलाल त्रिपाठी ने बताया कि उन्होंने पूरे प्रकरण की शिकायत जिलाधिकारी बांदा से की थी। किसान के अनुसार, डीएम ने स्वयं एसडीएम को फोन कर स्टे के अनुपालन और निर्माण रोकने के निर्देश दिए, लेकिन इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
किसान का आरोप है कि प्रशासन के ढुलमुल रवैये ने दबंग पक्ष को बढ़ावा दिया और विवादित भूमि पर रातों-रात निर्माण जारी रहा।
"जब आदेश भी प्रभावी न हों, अनशन ही अंतिम रास्ता"
वयोवृद्ध किसान ने कहा कि अदालत के स्टे की अनदेखी और जिलाधिकारी के आदेशों के अनुपालन न होने के बाद उनके पास आमरण अनशन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। उनकी मांग है कि स्टे ऑर्डर का पालन कराया जाए, अवैध निर्माण तत्काल रोका जाए और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों का समर्थन, प्रशासन मौन
तुर्रा गाँव के कई ग्रामीणों ने त्रिपाठी के दावों का समर्थन किया है। उनका कहना है कि यदि जमीन पर स्टे है तो निर्माण रुकना चाहिए। दूसरी ओर, एसडीएम, कानूनगो और लेखपाल की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
कानूनी स्थिति गंभीर
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, स्टे के बावजूद निर्माण कराना अदालत की अवमानना की श्रेणी में आता है और इसमें संबंधित पक्ष के साथ-साथ निगरानी करने वाले अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो सकती है।
सवाल बरकरार: क्या मिलेगा न्याय?
किसान का अनशन जारी है और स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है। स्थानीय जनमानस में यह प्रश्न गूंज रहा है कि—
क्या कोर्ट आदेश की अवहेलना करने वालों पर कार्रवाई होगी? और क्या वृद्ध किसान को न्याय मिल पाएगा?
