देश के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने एक बहस छेड़ी है ,अमीर दलितों को आरक्षण छोड़ देना चाहिए । यह बहस कोई नई नहीं है आज से ढाई दशक पूर्व इस बहस की शुरुआत आंबेडकर महासभा से शुरू हुई थी तब महासभा की कार्यकारिणी में कई सीनियर ब्यूरोक्रेट्स थे । इस अवधारणा का सबसे ज़्यादा विरोध दलित आई ए एस अधिकारियों ने किया था जिनके बच्चे विदेश में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे ।
सी जे आई गवई ने इस बहस को राष्ट्रव्यापी बना दिया है । आज दलितों में भी एक अमीर वर्ग पैदा हो गया है जिसे आम ग़रीब दलितों की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है । स्वाभाविक है जो सुविधा संपन्न होगा उसके बच्चे आम ग़रीब दलितों के बच्चों से आगे निकल जाएँगे । आम दलित का बच्चा तो छात्रवृत्ति के सहारे ही पढ़ पाता है ।वैसे भी कौड़ीपति और करोड़पति में अंतर पर बहस तो लाज़मी है । इस बहस में कई प्रोग्रेसिव दलित आई ए एस अधिकारियों ने ,समर्थ दलित आरक्षण छोड़ें, इस बहस का समर्थन भी किया था ।मेरी सोच है कि इस सामयिक मुद्दे पर स्वस्थ बहस होनी चाहिए ।
यह भी स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं आरक्षण का प्रबल समर्थक हूँ किंतु इसकी पहुँच उन दलितों तक भी होना चाहिए जिनके घरों में आरक्षण का उजाला अभी तक नहीं पहुँचा । आप कह सकते हैं कि आरक्षण , गरीबी उन्मूलन योजना नहीं है किंतु दलितों की सदियों की बेबसी और बेचारगी दूर करने के लिए यदि इसे दलित गरीबी योजना के रूप में लागू कर दिया जाय तो इससे क्या नुकसान होगा । आज यदि डा. आंबेडकर होते तो इस मुद्दे पर क्या वे खामोश होते
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माननीय पूर्व न्यायाधीश गवाई साहब के नाम एक खुला पत्र
प्रेषक – राजेश कुमार सिद्धार्थ
अध्यक्ष, डॉक्टर अंबेडकर संवैधानिक महासंघ
मान्यवर,
आपके हाल ही में दिए गए उस वक्तव्य को मैंने गंभीरता से सुना जिसमें आपने कहा कि “जो दलित आर्थिक रूप से सक्षम हो चुके हैं, जो दलित आईएएस, पीसीएस, जज, सांसद, विधायक, मंत्री या मुख्यमंत्री जैसे पदों तक पहुँच चुके हैं, उन्हें आरक्षण छोड़ देना चाहिए।”
मैं आपके विचार का सम्मान करता हूँ, परंतु आपके इस बयान से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिनका उत्तर मैं विनम्रतापूर्वक आपसे जानना चाहता हूँ।
1. क्या ऊँचे पद पर पहुँच जाने से सामाजिक–धार्मिक बराबरी मिल जाती है?
आप स्वयं देश के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे, परंतु क्या आपकी जाति बदल गई?
क्या समाज ने आपको “मुख्य न्यायाधीश” नहीं बल्कि “दलित मुख्य न्यायाधीश” के रूप में नहीं देखा?
क्या आपको जूते नहीं दिखाए गए?
यदि सामाजिक बराबरी मिल गई होती, तो यह अपमान होता ही नहीं।
2. क्या दलित राष्ट्रपति होने से सम्मान मिल गया?
यदि पद से सामाजिक बराबरी मिलती तो —
* क्या महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू संसद भवन उद्घाटन समारोह से बाहर रखी जातीं?
* क्या उन्हें राम मंदिर उद्घाटन में नहीं बुलाया जाता?
* क्या पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी के साथ भी ऐसा व्यवहार संभव होता?
स्पष्ट है कि पद ऊँचा हो सकता है, पर समाज की दृष्टि आज भी जाति देखकर ही बनती है।
3. जब तक सामाजिक–धार्मिक समानता नहीं, तब तक आरक्षण छोड़ना संविधान का अपमान होगा
बाबा साहेब ने आरक्षण आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक उत्पीड़न के आधार पर दिया था।
यदि समाज आज भी “उच्च–नीच” मानता है,
यदि आज भी दलित–पिछड़ा से घृणा की जाती है,
यदि आज भी जातिसूचक शब्द, भेदभाव और हिंसा जारी है…
तो आरक्षण कैसे छोड़ा जा सकता है?
4. आदेश क्यों नहीं कि जाति व्यवस्था छोड़नी चाहिए?
आपने जब कहा कि दलित अधिकारी आरक्षण छोड़ें,
तो क्या यह आदेश नहीं होना चाहिए कि—
* जाति व्यवस्था समाप्त हो,
* मंदिरों में पुजारी का पद सर्व समाज के लिए खुले,
* कोई भी व्यक्ति शिक्षा के आधार पर “ब्राह्मण” कहलाए न कि जन्म के आधार पर?
* जातिसूचक गाली देने वालों पर कठोरतम सजा (यहाँ तक कि फांसी तक) का प्रावधान हो?
* समानता और मानवता के विरुद्ध जाति मानने वालों पर कानूनी कार्रवाई हो?
यदि “कुछ छोड़ना” है तो पहले जाति, ऊँच–नीच, पाखंड और मनुवादी व्यवस्था छोड़नी चाहिए।
5. ऊँचे पद पर बैठे दलित–पिछड़ों के साथ भी जातिभेद
आप मुख्य न्यायाधीश रहे—
पर जूता फेंककर दुनिया को बता दिया गया कि “जाति” आपके पद से भी बड़ी मानी जाती है।
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ हुआ व्यवहार भी जाति आधारित ही था।
कुर्सी गई तो गंगाजल और गोमूत्र से कुर्सी धोई गई।
यह दिखाता है कि जाति व्यवस्था कितनी गहरी है।
6. जब तक सम्मान नहीं, तब तक आरक्षण नहीं छोड़ा जा सकता
आरक्षण तभी छोड़ा जा सकता है जब—
* दलित–पिछड़ों को इंसान माना जाए
* उन्हें सामाजिक व धार्मिक बराबरी मिले
* उन्हें भाईचारे से स्वीकार किया जाए
* जाति के आधार पर कोई अपमान न हो
* मनुवादी सोच समाप्त हो जाए
जब तक ऐसा नहीं होता, आरक्षण छोड़ना बाबा साहेब के संविधान और लोकतंत्र दोनों का अपमान होगा।
7. हमारा मिशन — जाति छोड़ो, मानवता अपनाओ
हम यह नहीं कहते कि कोई पद छोड़े,
हम कहते हैं—
जाति छोड़ो, भेदभाव छोड़ो, ऊँच–नीच छोड़ो।
जब यह व्यवस्था समाप्त हो जाएगी,
उस दिन आरक्षण अपने आप अप्रासंगिक हो जाएगा।
अंत में
मैं आपका सम्मान करता हूँ और आपके अनुभव का मूल्य समझता हूँ।
इसी कारण आपसे यह प्रश्न सार्वजनिक रूप में पूछ रहा हूँ।
आशा है आप बताएँगे—
क्या आपको आज भी सामाजिक–धार्मिक बराबरी मिल पाई है?
यदि नहीं, तो फिर आरक्षण छोड़ने की बात क्यों?
आपका
राजेश कुमार सिद्धार्थ
अध्यक्ष — डॉक्टर अंबेडकर संवैधानिक महासंघ

