ऊँचाहार (रायबरेली)। विकास की बातें करने वाले नेता, सुविधाओं के बड़े-बड़े बोर्ड लगाने वाली रेलवे और सफाई के ढोल पीटने वाले अफसर—क्या सभी के कान बधिर हो चुके हैं? या फिर ऊँचाहार रेलवे स्टेशन इनके लिए ‘अदृश्य’ हो चुका है? यहाँ की हालत देखकर ऐसा लगता है कि ऊँचाहार रेलवे स्टेशन नहीं, बल्कि एक ‘त्यागा हुआ खंडहर’ है, जहाँ रोजाना हजारों यात्री मजबूरी और लाचारी के साथ सफर करते हैं सबसे शर्मनाक उदाहरण है स्टेशन पर केवल एक ही टिकट काउंटर, जहां आरक्षण, लोकल और तत्काल—तीनों तरह के टिकट जारी होते हैं। कौन समझदार अधिकारी होगा जिसने तीनों भारी काम एक ही खिड़की पर डाल दिए? सवाल उठता है—क्या यात्रियों को टिकट लेने भेजा जाता है या कुश्ती लड़ने? सुबह 10 बजे तत्काल टिकट खुलते ही भीड़ तूफान बनकर टूट पड़ती है, उसी समय लोकल ट्रेनों का आगमन होता है और फिर शुरू होता है विवाद, धक्का, तकरार और अफरातफरी। रेलवे नियमों का पाठ पढ़ाने वालों से सवाल—जब आप खुद नियमों के नाम पर यात्रियों को परेशान कर रहे हैं, तो क्या नैतिक अधिकार बचता भी है? स्टेशन की स्थिति ऐसी है कि लगता है सफाईकर्मी यहां कभी आते ही नहीं। कचरे के ढेर, बजबजाती नालियाँ, टूटी बेंचें, बदबूदार हवा—क्या यही है रेलवे की ‘स्वच्छता मिशन’? जिस स्टेशन से रोज हजारों लोग गुजरते हैं, वहां गंदगी ऐसी कि लोग नाक पर रुमाल रखकर चलने को मजबूर हों। शर्म की बात यह है कि सालों से शिकायतें होती रहीं, लेकिन जिम्मेदारों की कुर्सियाँ शायद साउंडप्रूफ कमरे में रखी हैं, जहां जनता की आवाज पहुँचती ही नहीं।अब बात शौचालय की—यानी ‘रेलवे की सबसे बड़ी विफलता’। स्टेशन पर जो एक शौचालय है, उस पर हमेशा ताला टंगा रहता है। ताला इसलिए कि यात्री परेशान रहें और अधिकारी शांत। आखिर शौचालय पर ताला क्यों? क्या यह जनता का स्टेशन है या किसी अधिकारी की निजी कोठी? महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की परेशानियाँ रेलवे को क्यों नहीं दिखतीं? क्या यात्रियों की प्रतिष्ठा रेलवे के लिए कोई मायने नहीं रखती? मुख्य द्वार से करीब 50 मीटर दूर बना एक ऊँचा फ्लाईओवर, जिसे पार कर प्लेटफॉर्म 2 या 3 पर जाना होता है। सोचिए—ट्रेन समय पर आ जाए तो यात्री दौड़ते-दौड़ते भी प्लेटफ़ॉर्म नहीं पहुँच पाते, मजबूरी में वे पटरी क्रॉस करते हैं। यह हादसा नहीं तो और क्या है? क्या रेलवे किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है क्या जान जाने पर ही अधिकारियों की नींद खुलेगी पहले मुख्य द्वार के पास एक सुविधाजनक ब्रिज था। उसे क्षतिग्रस्त बताकर तोड़ दिया गया। तो फिर नया क्यों नहीं बनाया गया क्या रेलवे ऊँचाहार के लोगों को दंडित कर रहा है क्या ऊँचाहार रेलवे विभाग की प्राथमिकता सूची में है ही नहीं? या फिर भ्रष्टाचार का ऐसा खेल चल रहा है कि जनता की सुविधाएँ ‘फाइलों’ में दफन हो चुकी हैं? तो फिर रेलवे किस बात पर गर्व करता है? किस विकास की बात करता है? ऊँचाहार के यात्रियों ने कभी क्या गलत किया कि उन्हें यह सज़ा दी जा रही है? जनता अब सीधे सवाल पूछ रही यात्रियों की शिकायतें कौन सुनेगा? और सबसे बड़ा—क्या ऊँचाहार रेलवे स्टेशन को विकसित करना रेलवे की प्राथमिकता में है भी या नहीं? ऊँचाहार की स्थिति देखकर यह कहना गलत नहीं कि रेलवे द्वारा किया जाने वाला ‘सौतेला व्यवहार’ अब जनता के सब्र से खेल रहा है। यात्री अब सवाल नहीं, जवाब चाहते हैं—और रेलवे की चुप्पी इस उपेक्षा का सबसे बड़ा प्रमाण है।

