वही गुरुर ब्लॉक के अंतर्गत अरकार में खेत की अर्जुन लकड़ी की अवैध कटाई कार्रवाई ने उजागर किया भ्रष्टाचार का दलदल! पर्यावरण पर मंडराती भीषण आपदा
बालोद:- बालोद जिला में गुरूर ब्लॉक के अरकार गांव में खेत की अर्जुन लकड़ी की अवैध कटाई ने भ्रष्टाचार, पर्यावरण विनाश और किसान शोषण के काले गठजोड़ की पूरी सच्चाई को बाहर खींचकर रख दिया है। यह मामला सिर्फ पेड़ों के अवैध ढेर की बरामदगी नहीं, बल्कि उस गहरे सड़ांध भरे तंत्र का प्रमाण है जिसमें लकड़ी माफिया, भ्रष्ट अधिकारियों और प्रशासनिक सुस्ती ने मिलकर जिले की हरियाली को नष्ट करने का ठेका ले रखा है।गुरूर SDM की कार्रवाई ने इस पूरे खेल की पोल खोलते हुए एक बार फिर सवाल उठाए हैं।क्या बालोद जिले में शासन सिर्फ कागज़ों में काम कर रहा है? क्या अपराधियों के सामने सरकारी सिस्टम पूरी तरह घुटने टेक चुका है?
भ्रष्टाचार का वो काला चेहरा, जो खेतों तक आ पहुँचा
अरकार गांव में अर्जुन लकड़ी की अवैध कटाई इस बात का ताज़ा सबूत है कि बालोद जिला भ्रष्टाचार के ऐसे दलदल में फंस चुका है जहाँ अवैध तस्करी अधिकारियों की मिलीभगत विभागों की मौन सहमति और माफियाओं की बेलगाम दादागिरी मिलकर एक संगठित आपराधिक उद्योग खड़ा कर चुके हैं।खेतों में लगे अर्जुन के पेड़ इसलिए काटे जाते हैं क्योंकि इसका बाजार में ऊँचा दाम मिलता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल—क्या बिना विभागीय संरक्षण के कोई ठेकेदार इतनी व्यवस्थित कटाई कर सकता है?कागज़, परमिशन, सर्टिफिकेट, ट्रांसपोर्ट—हर जगह अधिकारी चाहिए।और जब हर जगह अधिकारी चाहिए, तो चोरी इतनी निर्भीक कैसे हो रही है?इसका एक ही जवाब है—भ्रष्टाचार ज़िंदा है, और ईमानदारी बीमार।
पर्यावरण पर बड़ा प्रहार अर्जुन के पेड़ों का सफाया भविष्य की बर्बादी
अर्जुन का पेड़ सामान्य पेड़ नहीं होता।यह खेती के लिए जीवनरेखा है—मिट्टी को बांधता है,पानी को रोकता है,खेत की नमी बढ़ाता है,हवा की शुद्धता बनाए रखता है।लेकिन जब ऐसे पेड़ कट जाते हैं तो जमीन दो साल में ही कंकड़ और धूल में बदल जाती है।अरकार में कटे पेड़ों ने यह साफ कर दिया है कि जिले में पर्यावरण का खुला नरसंहार चल रहा है।वन विभाग और शासन दोनों जानकर चुप हैं, लापरवाह हैं, और शायद इस अपराध में सहभागी भी।आज पेड़ कट रहे हैं, कल पानी गायब होगा, और परसों किसानों के हाथों में सूखी मिट्टी ही बचेगी।यह सिर्फ लकड़ी तस्करी नहीं—यह पर्यावरण आपदा की पूर्वसूचना है।
जद्दोजहद खेत बचाने की लड़ाई सिस्टम से नहीं माफियाओं से
अरकार जैसी घटनाएँ किसानों की असली कठिनाई उजागर करती हैं।किसान जमीन बचाए, पेड़ लगाए, उत्पादन बढ़ाए—लेकिन जब माफिया रातों-रात खेतों के पेड़ गायब कर दे और शासन सिर्फ बयान जारी करे, तो इसे अत्याचार नहीं तो क्या कहा जाएगा?किसान सालों तक अर्जुन का पेड़ पालते हैं और एक ठेकेदार दो घंटों में उसे काटकर ले जाता है।शिकायत करें तो विभाग बहाने बनाता है।आवाज़ उठाएँ तो डराया जाता है।और जब कार्रवाई होती है तो सिर्फ लकड़ी जप्त—अपराधी आज़ाद!
यह धैर्य, मेहनत और अधिकारों पर सीधा हमला है।
गुरूर SDM की कार्रवाई—सिस्टम में बची ईमानदारी की अंतिम निशानी
इस मामले में गुरूर SDM ने जो निर्णायक कदम उठाया, वह इस डूबते सिस्टम में एकमात्र ताज़ी हवा जैसा है।लेकिन एक SDM कब तक अकेला लड़ेगा?अवैध कटाई का यह नेटवर्क इतना बड़ा है कि बिना उच्चस्तरीय कठोर कार्रवाई के यह कभी खत्म नहीं होने वाला।यह जप्ती बताती है कि समस्या प्रशासन में नहीं—शासन की नीयत में है।
प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद—जनता की आंख, माफिया का डर
अगर प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद ने इस काले खेल की परतें न खोली होतीं, तो यह मामला भी फाइलों की धूल में दब जाता।क्लब लगातार ऐसे घोटालों को उजागर कर प्रशासन को मजबूर कर रहा है कि वह कार्रवाई करे।वरना शासन की चुप्पी इस जिले की हरियाली को हमेशा के लिए खत्म कर देगी।खेत बचाओ, कानून बचाओ, वरना बालोद उजड़ जाएगा अब यह केवल लकड़ी चोरी नहीं—यह जिले के भविष्य पर हमला है।शासन को अब चुनना होगा—अवैध माफिया या किसान?भ्रष्टाचार या पर्यावरण?चुप्पी या न्याय?यदि ठेकेदारों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में पूरा गुरूर-बालोद क्षेत्र का जमीन बंजर धूल में बदल जाएगा।
