प्रेस नोट राजधानी लखनऊ में आज डॉ. आंबेडकर संवैधानिक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजेश कुमार सिद्धार्थ के आह्वान पर भागीदारी आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री पी.सी. कुरील, राष्ट्रीय भागीदारी आंदोलन, सेवा स्तंभ सहित अनेक सामाजिक, शैक्षणिक एवं बहुजन संगठनों के पदाधिकारियों ने संयुक्त रूप से राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन जिला प्रशासन के माध्यम से प्रस्तुत किया। यह ज्ञापन यूजीसी से संबंधित कानून पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के विरोध में दिया गया, जिसमें इसे सामाजिक न्याय, समानता और संविधान की मूल भावना के विरुद्ध बताया गया।
ज्ञापन सौंपते समय उपस्थित नेताओं ने कहा कि यूजीसी कानून का उद्देश्य उच्च शिक्षा में समान अवसर सुनिश्चित करना था, जिससे दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के विद्यार्थियों को शिक्षा के क्षेत्र में सम्मानजनक भागीदारी मिल सके। लेकिन कुछ संकीर्ण मानसिकता वाली शक्तियाँ आज भी नहीं चाहतीं कि समाज के वंचित तबके के लोग आगे बढ़ें और प्रशासनिक, न्यायिक तथा शैक्षणिक पदों पर पहुँचें।
डॉ. आंबेडकर संवैधानिक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजेश कुमार सिद्धार्थ ने अपने संबोधन में कहा कि यह देश संविधान से चलता है, न कि मनुवादी सोच से। उन्होंने कहा कि कुछ लोग आज भी यह नहीं चाहते कि मानव-मानव एक समान हो और सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हों। सदियों से शोषित और उत्पीड़ित दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के बच्चों को पढ़ने-लिखने से रोकने की मानसिकता आज भी मौजूद है। यही कारण है कि जब भी समानता और अधिकार की बात होती है, तो कुछ लोग उसका विरोध करने लगते हैं।
श्री सिद्धार्थ ने कहा कि इतिहास गवाह है कि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को शिक्षा से दूर रखने के लिए हर दौर में साजिशें रची गईं। आज भी शिक्षण संस्थानों में इन समाजों के छात्रों के साथ भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक अपमान की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। यूजीसी से जुड़ा कानून इसी भेदभाव को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, लेकिन समानता से भयभीत शक्तियों ने इसका विरोध किया और परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर रोक लगा दी गई।
उन्होंने कहा कि यह केवल एक कानून का मामला नहीं है, बल्कि करोड़ों बहुजन समाज के भविष्य का प्रश्न है। यदि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के युवाओं को आगे बढ़ने से रोका गया तो यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का खुला उल्लंघन होगा। उन्होंने सरकार और माननीय न्यायालय से मांग की कि यूजीसी कानून पर लगाई गई रोक को तत्काल हटाया जाए और सामाजिक न्याय को मजबूत किया जाए।
भागीदारी आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री पी.सी. कुरील ने कहा कि भागीदारी आंदोलन का मूल उद्देश्य सत्ता, शिक्षा और संसाधनों में सभी वर्गों की समान हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि जब तक शिक्षा में समान अवसर नहीं मिलेगा, तब तक सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा। यूजीसी पर लगी रोक बहुजन समाज की प्रगति को रोकने का प्रयास है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
श्री कुरील ने कहा कि यह लड़ाई केवल दलित, पिछड़े या अल्पसंख्यक समाज की नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई है। यदि आज शिक्षा में भेदभाव को बढ़ावा दिया गया तो कल इसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार और न्यायालय ने इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाई तो भागीदारी आंदोलन देशभर में व्यापक जन आंदोलन छेड़ेगा।
डॉ. आंबेडकर संवैधानिक महासंघ के मुख्य संयोजक श्री रामचंद्र पटेल ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अवसर देने की गारंटी देता है। उन्होंने कहा कि यूजीसी कानून सामाजिक समरसता को बढ़ाने वाला कानून था, लेकिन इसके विरोध ने यह साबित कर दिया कि कुछ लोग आज भी जातिगत वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक को तत्काल हटाया जाए।
युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अभय प्रताप सिंह त्यागी ने कहा कि देश का युवा वर्ग अब अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो चुका है। उन्होंने कहा कि यदि बहुजन युवाओं को शिक्षा से वंचित किया गया तो वे चुप नहीं बैठेंगे। सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष किया जाएगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा ही सामाजिक क्रांति का सबसे बड़ा हथियार है और इस पर किसी भी प्रकार का हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय संयोजक डॉ. सत्य दोहरे ने कहा कि दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज की महिलाओं के लिए शिक्षा आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का माध्यम है। यूजीसी कानून पर रोक महिलाओं की प्रगति पर भी सीधा प्रहार है। उन्होंने कहा कि जब महिलाएँ शिक्षित होंगी तभी समाज सशक्त होगा।
सेवा स्तंभ के प्रतिनिधि श्री सी.एल. राजन ने कहा कि सामाजिक संगठनों ने हमेशा संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने कहा कि यूजीसी कानून को कमजोर करना सामाजिक न्याय की अवधारणा को कमजोर करना है। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह बहुजन समाज की भावनाओं को समझे और तुरंत सकारात्मक कदम उठाए।
अन्य सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी पर लगाई गई रोक को तत्काल बहाल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो बहुजन समाज को आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
सभी नेताओं ने एक स्वर में कहा कि यह आंदोलन किसी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह संविधान, समानता और सामाजिक न्याय के पक्ष में है। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज अपने अधिकारों के लिए एकजुट है और किसी भी कीमत पर पीछे हटने वाला नहीं है।
ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से यह मांग की गई कि यूजीसी कानून पर लगी रोक को शीघ्र हटाया जाए, शिक्षण संस्थानों में व्याप्त भेदभाव पर रोक लगाई जाए और दलित, पिछड़े एवं अल्पसंख्यक समाज के छात्रों को समान अवसर प्रदान किए जाएँ।
कार्यक्रम के अंत में सभी संगठनों ने यह संकल्प लिया कि यदि बहुजन समाज के संवैधानिक अधिकारों को बहाल नहीं किया गया तो आने वाले समय में प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
