राज्यमंत्री विश्वनाथ का वक्तव्य: पत्रकारिता में समर्पण का आदर्श उदाहरण
अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम के उपाध्यक्ष (राज्यमंत्री) श्री विश्वनाथ ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा —
“राजेश कुमार सिद्धार्थ कठिन परिस्थितियों में भी ‘बहुजन संगठक’ को साप्ताहिक से दैनिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। उन्होंने स्थानीय संपादक सोनम गौतम को कमान सौंपकर समाज के नए नेतृत्व को भी अवसर दिया है।”
राज्यमंत्री ने आगे कहा —
“राजेश कुमार सिद्धार्थ केवल एक पत्रकार नहीं हैं, बल्कि एक मिशनरी सोच वाले व्यक्ति हैं जिन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई समाज की चेतना जगाने में लगाई है। उन्होंने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मिशन के रूप में अपनाया है। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि समाज सेवा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।”
विचार की जड़ें: कांशीराम साहब का दृष्टिकोण
“बहुजन संगठक” की नींव उस समय रखी गई थी जब बहुजन समाज की आवाज़ सत्ता और समाज दोनों के हाशिये पर थी।
मान्यवर कांशीराम साहब ने इस समाचार पत्र को केवल समाचार माध्यम नहीं, बल्कि विचारों की क्रांति का माध्यम बनाया।
उन्होंने कहा था —
“यदि बहुजन समाज को सत्ता में भागीदारी चाहिए, तो उसे पहले अपनी आवाज़ के लिए मंच तैयार करना होगा।”
इसी विचार के अनुरूप “बहुजन संगठक” की शुरुआत हुई — एक ऐसा मंच जो दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक और शोषित वर्गों की पीड़ा को शब्दों में बदलकर समाज के सामने रखे।
आज वही मंच राजेश कुमार सिद्धार्थ के नेतृत्व में पुनः जन-जन की आवाज़ बन रहा है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ: विचारों के योद्धा
राजेश कुमार सिद्धार्थ का व्यक्तित्व पत्रकारिता, समाज सेवा और वैचारिक नेतृत्व — तीनों का संगम है।
उन्होंने 2010 से “बहुजन संगठक” के पुनर्प्रकाशन का कार्य शुरू किया, जब यह मिशन लगभग ठहर गया था।
सीमित संसाधनों, आर्थिक तंगी, और प्रशासनिक अड़चनों के बावजूद उन्होंने इसे बंद नहीं होने दिया।
उन्होंने स्वयं कहा था —
“बहुजन संगठक सिर्फ कागज़ पर छपने वाला पत्र नहीं है, यह समाज की आत्मा की आवाज़ है।”
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने न केवल पत्र का पुनर्प्रकाशन किया, बल्कि इसे आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँचाया।
उनकी सोच स्पष्ट रही है — “समाचार केवल घटनाएँ नहीं, बल्कि चेतना होते हैं।”
महिला नेतृत्व को बढ़ावा: सोनम गौतम की नियुक्ति
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने जिस बात पर विशेष ध्यान दिया, वह है महिला नेतृत्व का सशक्तिकरण।
उन्होंने सोनम गौतम को “बहुजन संगठक” की स्थानीय संपादक बनाकर यह संदेश दिया कि बहुजन आंदोलन अब केवल पुरुष नेतृत्व तक सीमित नहीं रहेगा।
सोनम गौतम ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए पत्र की वैचारिक दिशा को और सशक्त बनाया।
उन्होंने कहा —
“राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मुझे केवल संपादक नहीं, बल्कि समाज की आवाज़ बनने का अवसर दिया है। यह जिम्मेदारी मेरे लिए सम्मान भी है और संघर्ष की प्रेरणा भी।”
इस कदम से बहुजन संगठक की पहचान और व्यापक हुई। समाज के हर वर्ग — विशेषकर महिलाओं और युवाओं — में यह संदेश गया कि यह मंच समानता और अवसर का प्रतीक है।
पत्रकारिता का मिशन: सत्ता से नहीं, समाज से जुड़ाव
आज के दौर में जब पत्रकारिता बड़े उद्योगों का हिस्सा बन गई है, वहाँ “बहुजन संगठक” एक अपवाद है।
यह समाचार पत्र किसी पूंजीपति या राजनीतिक दल का मुखपत्र नहीं, बल्कि जनचेतना का प्रतीक है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने अपनी मेहनत की कमाई समाज के इस मिशन में लगाई।
वे कहते हैं —
“पत्रकारिता तब तक जीवित है जब तक वह सत्ता से नहीं, समाज से जुड़ी रहे।”
राजेश कुमार सिद्धार्थ के इसी दृष्टिकोण ने “बहुजन संगठक” को मिशनरी पत्रकारिता की श्रेणी में स्थापित किया है।
‘दलित घोष’ पत्रिका: समाज की गूंज
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने “दलित घोष” मासिक पत्रिका का भी संपादन और प्रकाशन शुरू किया, जिसका उद्देश्य था — वंचित वर्ग की वास्तविक समस्याओं को सरकार और जनता के बीच लाना।
इस पत्रिका में किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और ग्रामीण समाज की आवाज़ को प्रमुखता दी जाती है।
यह मासिक पत्रिका आज बहुजन समाज की नई वैचारिक धारा बन चुकी है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ की बहुआयामी भूमिका
पत्रकारिता से इतर, राजेश कुमार सिद्धार्थ अनेक सामाजिक और संवैधानिक संगठनों से भी जुड़े हैं —
अंतर्राष्ट्रीय भीम आर्मी
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति जनजाति पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक विकास परिषद
डॉ. अंबेडकर संवैधानिक महासंघ
बहुजन विकास परिषद
अंतरराष्ट्रीय प्रेस परिषद
इन सभी संस्थाओं में उन्होंने नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है और समाज के हर वर्ग को जोड़ने का प्रयास किया है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ की पत्रकारिता: जनसरोकार की परिभाषा
राजेश कुमार सिद्धार्थ की पत्रकारिता जनपक्षधरता की मिसाल है।
वे न तो सत्ता के खिलाफ अंध विरोध करते हैं और न ही किसी विचारधारा के अंध अनुयायी हैं।
उनका उद्देश्य स्पष्ट है — “समाज में न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्य स्थापित करना।”
वे प्रत्येक अंक में न केवल खबरें प्रकाशित करते हैं, बल्कि उस खबर के पीछे छिपे सामाजिक अर्थ को भी सामने लाते हैं।
यह पत्रकारिता केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि पाठक के भीतर प्रश्न और विचार भी जगाती है।
बहुजन संगठक की सामाजिक भूमिका
आज “बहुजन संगठक” केवल समाचार पत्र नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन है।
यह शिक्षा, सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण, युवाओं के अधिकार, दलित अत्याचार, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर जनजागरण अभियान चला रहा है।
हर अंक समाज को सोचने, समझने और संगठित होने की दिशा देता है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने कहा —
“हम सत्ता से लड़ने नहीं, अन्याय से लड़ने के लिए लिखते हैं। हमारा लक्ष्य किसी दल की जय या पराजय नहीं, बल्कि समाज का उत्थान है।”
राज्यमंत्री विश्वनाथ की टिप्पणी का महत्व
राज्यमंत्री श्री विश्वनाथ का यह कथन केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि बहुजन संगठक के महत्व की आधिकारिक मान्यता भी है।
उन्होंने कहा —
“राजेश कुमार सिद्धार्थ जैसे पत्रकार लोकतंत्र की असली ताकत हैं। वे दिखाते हैं कि विचार, ईमानदारी और संघर्ष आज भी बदलाव ला सकते हैं।”
यह टिप्पणी न केवल राजेश कुमार सिद्धार्थ के लिए सम्मान है, बल्कि पूरे बहुजन समाज के लिए प्रेरणा भी।
निष्कर्ष: संघर्ष से समाज तक
राजेश कुमार सिद्धार्थ का जीवन और कार्य यह साबित करता है कि एक व्यक्ति यदि अपने विचारों में सच्चा हो, तो वह बिना किसी पद, पूंजी या सत्ता के भी समाज में परिवर्तन ला सकता है।
उन्होंने “बहुजन संगठक” को पुनर्जीवित करके यह दिखाया कि पत्रकारिता अभी भी लोकतंत्र की आत्मा है।
सोनम गौतम जैसी युवा संपादक, दलित घोष जैसी वैचारिक पत्रिका, और बहुजन संगठक जैसा जनमुखी समाचार पत्र —
इन सबके पीछे केवल एक उद्देश्य है — “बाबा साहेब अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम साहब के सपनों का भारत।”
अंतिम पंक्तियाँ
आज जब समाज वर्ग, जाति और संपत्ति के आधार पर बंटा हुआ है, तब “बहुजन संगठक” जैसी आवाज़ लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रख रही है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ और उनकी टीम का कार्य केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि विचारों का पुनर्जागरण है।
जय भीम! जय भारत! जय संविधान! नमो बुद्धाय!
