तुम जो फिरते हो लिए सर पे कदीमी तलवार।
तुमको मालूम भी है वक़्त कहां जाता है!
और इस वक्त से इंसान का रिश्ता क्या है!
तुम जो पापों को दान-दक्षिणा से ढकते हो।
और भगवान् को गुल्लक बना के रखते हो।
तुम जिन्हें चीखकर ताकत का भरम होता है।
ज़ुल्म से अपनी हुकूमत का भरम होता है।
तुम जिन्हें औरतों की आह मजा देती है।
जिनको इंसान की तकलीफ हंसा देती है।
तुम जिन्हें है ही नहीं इल्म कि गम क्या शै है।
कशमकश दिल की, निगाहों की शरम क्या शै है।
तुम तो उठते हो और जाके टूट पड़ते हो।
सोच की आंच पे घबरा के टूट पड़ते हो।
न ठहरते हो न सुनते हो न झिझकते हो।
राम ही जाने कि क्या-क्या अनर्थ बकते हो।
यूं कभी देश कभी धर्म कभी चाल-चलन।
असल वजह तो इस ग़ुस्से की है ये ठोस बदन।
इससे कुछ काम अब दिमाग़ को भी लेने दो।
ज़रा-सा गोश्त गमो-फिक्र को भी चखने दो।
जोशे-कमजर्फ इस मिट्टी को नहीं भाता है।
इसको दानां की उदासी पे प्यार आता है।
इसने हमलावरों को लोरियों से जीत लिया।
खून के वल्वलों को थपकियों से जीत लिया।
लेके लश्कर जो इसे जीतने आए बाबर।
इसका जादू कि उन्हीं से उगा दिए अकबर।
तंगनज़री से इसे पहचानना मुमकिन ही नहीं।
नफरतों से इसे पहचानना मुमकिन ही नहीं।
इसको जनना ही नहीं, पालना भी आता है।
सिर्फ भारत की मां नहीं, ये विश्वमाता है।
