बारा में प्रदूषण पर फूटा गुस्सा: “ज़हर उगलती फैक्ट्रियों पर लगे लगाम, नहीं तो होगा किसान आंदोलन”
पब्लिक हियरिंग में गूंजी चेतावनी: स्वास्थ्य, जल और हरियाली पर समझौता नहीं — दीपक तिवारी
बारा प्रयागराज। शनिवार को यमुनानगर क्षेत्र के बारा तहसील अंतर्गत नीबी लोहगरा में प्रस्तावित जेके लक्ष्मी सीमेंट प्लांट को लेकर आयोजित पब्लिक हियरिंग अब जन आक्रोश की बड़ी कहानी बनती जा रही है। कार्यक्रम भले ही उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से आयोजित किया गया, लेकिन सवालों के कटघरे में सिर्फ कंपनी ही नहीं, जिम्मेदार विभाग और अधिकारी भी खड़े नजर आए। सभा में किसान नेता दीपक तिवारी ने गर्जना करते हुए कहा कि कागजों में प्रदूषण नियंत्रण दिखाना और जमीन पर धूल- धुआं फैलाना—यह दोहरी नीति अब नहीं चलेगी। उन्होंने तीखा सवाल दागा कि आखिर प्रदूषण फैलाने की अनुमति किन शर्तों पर और किस स्तर के अधिकारी की सिफारिश से दी जा रही है?जब गांवों में हवा भारी है, पानी प्रभावित है और लोग बीमार पड़ रहे हैं,तो रिपोर्टों में सब कुछ “मानक के अनुरूप” कैसे दिखाया जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि युवाओं को रोजगार का झुनझुना पकड़ाकर कंपनियां अपने फायदे साध रही हैं। स्थानीय युवाओं को न स्थायी नौकरी, न पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और न ही कौशल प्रशिक्षण—फिर उद्योग का फायदा आखिर किसे? बुजुर्गों और बच्चों की बिगड़ती सेहत को लेकर भी सभा में तीखी नाराजगी दिखी। कई ग्रामीणों ने आंखों में जलन, लगातार पानी बहना, नजर कमजोर होना, सांस की दिक्कत और अन्य बीमारियों की शिकायतें गिनाईं।सवाल उठा कि स्वास्थ्य विभाग, पर्यावरण विभाग और प्रशासनिक अमला आखिर मौके पर वास्तविक सर्वे क्यों नहीं करा रहा? गौरतलब है कि कुछ दिन पूर्व किसान नेता दीपक तिवारी ने बारा की उपजिलाधिकारी प्रेरणा गौतम को धरना-प्रदर्शन की चेतावनी देते हुए ज्ञापन सौंपा था। ज्ञापन में साफ कहा गया था कि यदि प्रदूषण नियंत्रण, स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार, शुद्ध पेयजल आपूर्ति और व्यापक वृक्षारोपण की ठोस कार्ययोजना सार्वजनिक नहीं की गई तो आंदोलन की राह अपनाई जाएगी। दीपक तिवारी, जो भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक के मंडल उपाध्यक्ष युवामोर्चा हैं, ने प्रशासनिक अधिकारियों को सीधे चेताया कि जनभावनाओं की अनदेखी भारी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि यदि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, तहसील प्रशासन और संबंधित विभाग समय रहते पारदर्शी कार्रवाई नहीं करते, तो बारा की धरती पर बड़ा किसान आंदोलन खड़ा होगा, जिसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन पर होगी। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अधिकारी जनचिंताओं का जवाब तथ्यों और कार्रवाई से देते हैं या फिर कागजी खानापूर्ति से काम चलाते हैं।ग्रामीणों का साफ संदेश है—स्वास्थ्य और पर्यावरण से समझौता नहीं होगा, चाहे संघर्ष कितना भी लंबा क्यों न करना पड़े।

