पिता के त्याग और परिश्रम को समझे युवा पीढ़ी
गोरखपुर आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अक्सर हम उन हाथों को भूल जाते हैं जो दिन रात मेहनत कर हमारे लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हैं। पिता का सम्मान सिर्फ एक रिश्ता नहीं बल्कि संस्कार है। जो व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई से घर में भोजन लाता है, उसके प्रति सम्मान सबसे बड़ी पूंजी है।
समाज में पिता वह शख्स है जो बिना थके, बिना रुके परिवार की जरूरतों को पूरा करता है। गर्मी हो या सर्दी, वह अपने पसीने से परिवार का पेट भरता है। उसके इस त्याग को समझना और सम्मान देना हर बेटे-बेटी का पहला कर्तव्य है।
आज के समय में कई लोग झूठी शान दिखाने के लिए फिजूलखर्ची करते हैं। जबकि असली शान सादगी और सच्चाई में है। हमेशा उतना ही खर्च करें जितनी जरूरत हो। दूसरों का सम्मान करना कोई आदत नहीं बल्कि हमारे घर के संस्कार होते हैं। जो हमें बचपन से मिलते हैं।
हम जो गाना सुनते हैं, जो खाना खाते हैं या जो कपड़े पहनते हैं, उसके पीछे किसी न किसी की मेहनत और पसीना छुपा होता है। किसान खेत में पसीना बहाता है तभी अनाज घर तक पहुंचता है। मजदूर ईंट गारे में तपता है तभी मकान बनते हैं। इसलिए हर चीज और हर इंसान की मेहनत का सम्मान करना सीखें।समाजशास्त्रियों का मानना है कि अगर नई पीढ़ी अपने माता-पिता की मेहनत और दूसरों के श्रम का सम्मान करे तो समाज में अपराध और दिखावे की होड़ दोनों कम हो सकती है। सम्मान देने से ही सम्मान मिलता है। यही भारतीय संस्कारों की पहचान है।
