आमोद कुमार
बांदा किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके ऊंचे भवनों, चौड़ी सड़कों और विकास के दावों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर, सबसे असहाय और सबसे उपेक्षित लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। बांदा की सड़कों, रेलवे स्टेशन और बस अड्डों पर भटकते बेसहारा बुजुर्ग, निराश्रित महिलाएं और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग इसी कसौटी पर हमारी सामाजिक और प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा ले रहे हैं।विडंबना यह है कि जिस समाज ने "मातृदेवो भवः" और "पितृदेवो भवः" का आदर्श दिया, उसी समाज में कई बुजुर्ग आज फुटपाथ को बिस्तर और खुले आसमान को छत बनाने को मजबूर हैं। मानसिक रूप से अस्वस्थ लोग सड़कों पर भटक रहे हैं, लेकिन उनकी पीड़ा को देखने वाली निगाहें कम और नजरें फेर लेने वाले लोग अधिक दिखाई देते हैं। यह केवल गरीबी या लाचारी का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदनहीनता का मौन अभियोग है।इसी गंभीर विषय को उठाते हुए जदयू की प्रदेश उपाध्यक्ष एवं बुंदेलखंड प्रभारी शालिनी सिंह पटेल ने मंडलायुक्त को ज्ञापन सौंपकर विशेष रेस्क्यू और पुनर्वास अभियान की मांग की है। उनका तर्क बिल्कुल स्पष्ट है—यदि प्रशासन आपदा के समय युद्धस्तर पर अभियान चला सकता है, तो उन लोगों के लिए क्यों नहीं, जो हर दिन उपेक्षा, भूख और बीमारी से लड़ते हुए जीने की जंग हार रहे हैं?सवाल यह भी है कि क्या किसी इंसान की पहचान केवल उसके परिवार, संपत्ति या सामाजिक हैसियत से तय होगी? यदि कोई व्यक्ति मानसिक बीमारी से ग्रसित है या परिवार से बिछड़ गया है, तो क्या उसे सड़क पर मरने के लिए छोड़ देना ही व्यवस्था का अंतिम उत्तर है? नहीं, क्योंकि मानवता का पहला धर्म है—असहाय को सहारा देना।यह मांग केवल रेस्क्यू अभियान की नहीं, बल्कि उस सोच के पुनर्जागरण की है, जिसमें हर जीवन की कीमत हो, हर बुजुर्ग को सम्मान मिले और हर असहाय व्यक्ति को सुरक्षा का अधिकार प्राप्त हो। क्योंकि जब सड़कों पर इंसान बेसहारा भटकता है, तो शर्मिंदा केवल वह व्यक्ति नहीं होता, बल्कि पूरा समाज और उसकी व्यवस्था कठघरे में खड़ी दिखाई देती है। मानवता का असली अर्थ तभी सार्थक होगा, जब कोई भी व्यक्ति अपने ही समाज में लावारिस कहलाने को मजबूर न हो।
