iपीरियड्स की सफाई में कौन आगे, कौन पीछे? (Getty Image)
वहीं निचले आंकड़ों वाले राज्यों में बिहार 58.9%, मध्य प्रदेश 60.5%, मेघालय 64.9%, गुजरात 66.5%, असम 66.9% और छत्तीसगढ़ 68.8% शामिल हैं. हालांकि इन आंकड़ों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये NFHS-5 के राज्यवार आंकड़े हैं, जबकि सरकार ने NFHS-6 के लिए देश का 79.2% का नया आंकड़ा बताया है.
क्यों है पीरियड्स हाइजीन में अंतर?
माहवारी के दौरान हाइजीनिक तरीकों को अपनाने के आंकड़ों में अंतर के पीछे सिर्फ एक वजह नहीं होती. परिवार की आर्थिक स्थिति, सैनिटरी पैड या दूसरे सुरक्षित साधनों की उपलब्धता, साफ पानी और शौचालय जैसी सुविधाएं, साथ ही पीरियड्स को लेकर सही जानकारी और सामाजिक झिझक भी इसकी वजह हो सकती है. कई जगह लड़कियों और महिलाओं को माहवारी से जुड़े सुरक्षित तरीकों की पूरी जानकारी नहीं मिल पाती, तो कुछ परिवारों में महंगे हाइजीन प्रोडक्ट नियमित रूप से खरीदना आसान नहीं होता.
गांवों और दूरदराज के इलाकों में दुकान, पानी और स्वच्छ शौचालय की सुविधा की कमी भी परेशानी बढ़ा सकती है. वहीं सामाजिक सोच और पीरियड्स पर खुलकर बात न करने की आदत के कारण लड़कियां अपनी जरूरत या समस्या परिवार के सामने नहीं रख पातीं. यही वजह है कि एक ही देश में अलग-अलग राज्यों और सामाजिक समूहों के बीच माहवारी की स्वच्छता से जुड़े आंकड़ों में इतना अंतर दिखाई देता है.
SC-ST महिलाओं में आंकड़ा कम क्यों?
SC-ST महिलाओं में माहवारी के दौरान हाइजीनिक तरीकों का इस्तेमाल कई राज्यों में कम दिखता है, लेकिन इसके पीछे एक ही वजह नहीं है. आर्थिक स्थिति, सैनिटरी पैड या अन्य सुरक्षित साधनों की उपलब्धता, साफ पानी और शौचालय जैसी सुविधाओं की कमी इसका कारण हो सकती है. इसके अलावा माहवारी को लेकर सामाजिक झिझक और सही जानकारी का अभाव भी असर डाल सकता है. दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच समस्या को और बढ़ा सकती है. हालांकि, सभी राज्यों में स्थिति समान नहीं है. उदाहरण के लिए उत्तराखंड में ST महिलाओं का आंकड़ा 98.9% रहा, जो राज्य के कुल आंकड़े से ज्यादा है.
सरकार क्या कर रही है?
सरकार के मुताबिक, माहवारी की स्वच्छता से जुड़े प्रबंधन को मजबूत करने के लिए Menstrual Hygiene Scheme (MHS) चलाई जा रही है. यह योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर संचालित की जाती है. इसके अलावा पानी, स्वच्छता और इससे जुड़े दूसरे संकेतकों का डेटा संबंधित मंत्रालयों की ओर से जुटाया जाता है.
यानी सरकार की व्यवस्था में माहवारी की स्वच्छता को केवल सैनिटरी प्रोडक्ट के इस्तेमाल के आंकड़े से नहीं देखा जाता. साफ पानी, स्वच्छता और इससे जुड़े दूसरे पहलू भी अलग-अलग सरकारी विभागों के डेटा में शामिल होते हैं.

