आमोद कुमार
बांदा, 26 अगस्त। बुंदेलखंड की धरती पर पानी सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि खेती और किसान की जिंदगी का सवाल है। बारिश की अनिश्चितता और सिंचाई संसाधनों की बदहाली के बीच सांडा राजवाहा का कायाकल्प किसानों के लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया है। बबेरू तहसील क्षेत्र में नहर की दशा सुधारने के लिए सरकार ने 5.14 करोड़ रुपये की परियोजना शुरू की है।
सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग की देखरेख में शून्य से 23.900 किलोमीटर तक सांडा राजवाहा के पुनर्स्थापना और सीमांकन का कार्य कराया जा रहा है। विभाग का लक्ष्य है कि यह काम दिसंबर तक पूरा कर लिया जाए।
नहर की सफाई से लेकर कब्जों के सीमांकन तक
परियोजना के तहत नहर की सिल्ट सफाई, क्षतिग्रस्त किनारों की मरम्मत और जलप्रवाह में बाधा बनने वाले अतिक्रमणों के सीमांकन की कार्रवाई की जा रही है। वर्षों से उपेक्षा और अव्यवस्था की मार झेलती नहर को यदि निर्धारित समय में व्यवस्थित किया गया तो इसका सीधा असर खेतों तक पहुंचने वाले पानी पर पड़ेगा।कागज पर बनी सिंचाई योजनाएं तभी सार्थक होती हैं, जब नहर का पानी वास्तव में खेत की मेड़ तक पहुंचे। सांडा राजवाहा के मामले में असली परीक्षा भी यही है—5.14 करोड़ रुपये का निवेश नहर की तस्वीर बदलता है या सिर्फ सरकारी फाइलों का आंकड़ा बनकर रह जाता है।
किसानों के लिए नहर सिर्फ पानी नहीं, भविष्य है
बुंदेलखंड का किसान बारिश के भरोसे खेती करने को मजबूर रहा है। ऐसे में नहरों का मजबूत होना केवल सिंचाई व्यवस्था का सुधार नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाला कदम है। समय पर पानी मिलने से फसल का जोखिम घटेगा, उत्पादन बढ़ने की संभावना बनेगी और किसानों को सूखे के संकट से कुछ राहत मिल सकेगी।
लेकिन सरकार के दावों की असली कसौटी उद्घाटन या बजट नहीं, नहर के अंतिम छोर तक पानी पहुंचना है। यदि पुनर्स्थापना के साथ रखरखाव, अतिक्रमण नियंत्रण और नियमित जलप्रवाह सुनिश्चित हुआ, तभी हर खेत को पानी का संकल्प जमीन पर दिखाई देगा।अब निगाह दिसंबर की समय-सीमा पर
सांडा राजवाहा के कायाकल्प से किसानों को उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन उम्मीद को परिणाम में बदलना विभाग की जिम्मेदारी होगी। दिसंबर की समय-सीमा अब सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि उन किसानों की प्रतीक्षा का पैमाना है, जो अपनी फसल के लिए आसमान और नहर दोनों की ओर देखते हैं।बुंदेलखंड की प्यासे खेतों को घोषणाओं से नहीं, नहर के बहते पानी से तृप्ति मिलेगी। सांडा राजवाहा की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण यही होगा कि सरकारी खर्च की हर बूंद के बदले किसान के खेत तक पानी की धार पहुंचे।

