पीलीभीत में खेत में शिकार के लिए लगाए गए जाल में फंसा तेंदुआ, वन विभाग में मचा हड़कंप
ब्यूरो चीफ: रमेश कुमार | स्थान: पीलीभीत, उत्तर प्रदेश
पीलीभीत जनपद से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहाँ खेत में शिकार के लिए लगाए गए लोहे के जाल में एक तेंदुआ बुरी तरह फंस गया। यह घटना पीलीभीत शहर से सटे लुधपुरा गांव की है, जहां ग्रामीणों ने जब तेंदुए को जाल में फंसा देखा तो पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। वन मंत्री के जिले में प्रस्तावित आगमन के बीच इस घटना की जानकारी मिलते ही वन विभाग के अधिकारियों में हड़कंप मच गया। तत्काल सूचना पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर तेंदुए को सुरक्षित बाहर निकाला।
घटना की पूरी कहानी
शनिवार की सुबह लगभग आठ बजे लुधपुरा गांव के पास खेतों की ओर गए कुछ किसानों ने अचानक जोर-जोर की गुर्राहट सुनी। जब वे पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक वयस्क तेंदुआ खेत में बिछाए गए तार के जाल में बुरी तरह उलझा हुआ है। तेंदुआ खुद को छुड़ाने के प्रयास में बार-बार उछल रहा था, जिससे उसके पंजे और गर्दन में गंभीर चोटें आ गई थीं। ग्रामीण पहले तो डर के मारे खेत से दूर हट गए, लेकिन जब तेंदुआ थक गया और शांत पड़ा रहा, तब किसी ने वन विभाग को सूचना दी।
गांव के प्रधान हरिशंकर वर्मा ने बताया कि “सुबह खेतों में कुछ लोगों ने सूअर या नीलगाय पकड़ने के लिए जाल बिछाया था। हमें अंदेशा नहीं था कि उसमें तेंदुआ फंस जाएगा। सूचना मिलते ही हमने वन विभाग को फोन किया ताकि जानवर को सुरक्षित निकाला जा सके।”
वन विभाग की टीम की त्वरित कार्रवाई
सूचना मिलते ही पीलीभीत टाइगर रिजर्व और स्थानीय वन रेंज की संयुक्त टीम तत्काल मौके पर रवाना हुई। लगभग दो घंटे तक चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद तेंदुए को बेहोशी की दवा देकर सुरक्षित पकड़ा गया। टीम में वेटरनरी डॉक्टर डॉ. विकास शर्मा, रेंजर ऑफिसर अरुण कुमार, और टाइगर रिजर्व से आए विशेषज्ञ शामिल थे।
डॉ. विकास शर्मा ने बताया, “तेंदुआ लगभग पांच वर्ष का वयस्क नर है। जाल में फंसने से उसकी गर्दन और पिछले पैरों में घर्षण की चोटें आई हैं। प्राथमिक उपचार के बाद उसे अस्थायी क्वारंटीन एरिया में रखा गया है। जब तक पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो जाता, तब तक उसे जंगल में नहीं छोड़ा जाएगा।”
वन मंत्री के दौरे से पहले हलचल तेज
संयोगवश, इसी दिन प्रदेश के वन मंत्री का पीलीभीत जिले में निरीक्षण और बैठक का कार्यक्रम तय था। जैसे ही यह खबर उच्चाधिकारियों तक पहुंची, वन विभाग के कार्यालयों में हलचल बढ़ गई। वरिष्ठ अधिकारियों ने रेस्क्यू की रिपोर्ट तत्काल लखनऊ मुख्यालय को भेजी और स्थिति की जानकारी साझा की।
वन विभाग के अपर मुख्य वन संरक्षक (एसीएफ) संजय मिश्रा ने कहा, “हमारी प्राथमिकता तेंदुए की सुरक्षा है। किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस बात की जांच की जाएगी कि खेत में अवैध रूप से जाल किसने और किस उद्देश्य से लगाया था। जाल लगाना वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत दंडनीय अपराध है।”
ग्रामीणों में दहशत और उत्सुकता दोनों
घटना के बाद गांव और आसपास के क्षेत्रों में दहशत और उत्सुकता का माहौल है। सैकड़ों ग्रामीण खेत के पास जमा हो गए थे और मोबाइल से वीडियो बनाते नजर आए। पुलिस और वन विभाग की टीम को भीड़ को नियंत्रित करने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
ग्रामीण रामदास यादव ने कहा, “हमने ऐसा दृश्य पहली बार देखा। तेंदुआ बहुत ताकतवर था, लेकिन फंसे होने के कारण बेचैन था। हम डर गए थे कि कहीं हमला न कर दे।”
वहीं, वन विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे किसी भी तरह के जाल, तार या जालीनुमा उपकरण खेतों में न लगाएं, क्योंकि यह न सिर्फ वन्यजीवों के लिए खतरनाक है, बल्कि कानून के खिलाफ भी है।
तेंदुओं की बढ़ती आवाजाही का कारण
पीलीभीत जिला लंबे समय से टाइगर रिजर्व और घने जंगलों के लिए जाना जाता है। यहां तेंदुए, बाघ, हिरण, नीलगाय और अन्य वन्य जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में गांवों और जंगलों की सीमाओं के बीच की दूरी घटने से इन जानवरों की आवाजाही मानव बस्तियों तक बढ़ गई है।
वन विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में भोजन की कमी और मानव गतिविधियों के बढ़ने से जंगली जानवर अब खेतों और गांवों की ओर आने लगे हैं। कई बार वे पालतू पशुओं पर हमला कर देते हैं, जिससे ग्रामीण खुद सुरक्षा के लिए ऐसे खतरनाक जाल बिछा देते हैं।
वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट का उल्लंघन
भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार, किसी भी संरक्षित प्रजाति को नुकसान पहुँचाना, पकड़ना या घायल करना अपराध की श्रेणी में आता है। तेंदुआ इस अधिनियम की अनुसूची-1 में सूचीबद्ध है, जिसका अर्थ है कि इसे अधिकतम कानूनी सुरक्षा प्राप्त है।
यदि जांच में यह साबित होता है कि खेत में जाल मानवों द्वारा जानबूझकर लगाया गया था, तो संबंधित व्यक्तियों पर कठोर कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे अपराध के लिए सात वर्ष तक की सजा और जुर्माना दोनों का प्रावधान है।
वेटरनरी जांच और पुनर्वास प्रक्रिया
रेस्क्यू किए गए तेंदुए को फिलहाल पीलीभीत टाइगर रिजर्व के वन्यजीव उपचार केंद्र में रखा गया है। वेटरनरी टीम उसकी सेहत की लगातार निगरानी कर रही है। डॉक्टरों के अनुसार, तेंदुए को दो दिन तक सिडेशन (बेहोशी) से बाहर आने में समय लगेगा, जिसके बाद पूरी मेडिकल जांच की जाएगी।
यदि रिपोर्ट सामान्य आई तो वन विभाग की अनुमति के बाद उसे पुनः जंगल में छोड़ दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में विशेषज्ञों की टीम यह भी सुनिश्चित करेगी कि तेंदुए को उसी इलाके में छोड़ा जाए जहाँ से वह आया था, ताकि उसके प्राकृतिक व्यवहार पर असर न पड़े।
जनजागरूकता अभियान की आवश्यकता
इस घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कैसे रोका जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की कमी के कारण लोग शिकार रोकने या फसलों की सुरक्षा के नाम पर ऐसे जाल लगा देते हैं जो निर्दोष जंगली जानवरों के लिए घातक साबित होते हैं।
वन विभाग के प्रवक्ता ने बताया कि आने वाले समय में “मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व” पर विशेष जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, जिसमें ग्रामीणों को यह बताया जाएगा कि जंगली जानवरों से कैसे निपटा जाए और उनकी सूचना सही तरीके से कैसे दी जाए।
राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिक्रियाएँ
वन मंत्री के आगमन से पहले इस घटना ने प्रशासनिक तंत्र को अलर्ट कर दिया है। मंत्री ने स्वयं मुख्य वन संरक्षक से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए विशेष निर्देश जारी किए हैं।
जिलाधिकारी ने भी मौके का निरीक्षण करते हुए कहा कि “जंगल और बस्ती के बीच बफर जोन में सुरक्षा उपाय बढ़ाए जाएंगे। ग्रामीणों को चेताया जाएगा कि जाल लगाना गैरकानूनी है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करते पाया गया, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा
इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। कई लोगों ने वन विभाग की टीम की त्वरित कार्रवाई की सराहना की, वहीं कुछ ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों होती हैं।
पर्यावरण प्रेमी संगठनों ने भी बयान जारी कर कहा कि “जब तक गांवों के आसपास जंगली रास्तों की सुरक्षा और निगरानी नहीं बढ़ाई जाएगी, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे।”
निष्कर्ष
लुधपुरा गांव की यह घटना एक चेतावनी है कि मनुष्य और वन्यजीवों के बीच की सीमाएँ कितनी संवेदनशील हो चुकी हैं। एक तरफ ग्रामीण अपनी फसलों और पशुओं की रक्षा करना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास से बेदखल हो रहे हैं। ऐसे में केवल कानून नहीं, बल्कि समाज की जागरूकता भी बेहद आवश्यक है।
पीलीभीत के इस रेस्क्यू ऑपरेशन ने न केवल एक निर्दोष तेंदुए की जान बचाई, बल्कि यह संदेश भी दिया कि यदि इंसान सजग हो, तो प्रकृति के साथ तालमेल संभव है। वन विभाग ने इस घटना से सबक लेते हुए आसपास के इलाकों में निगरानी बढ़ाने और ग्रामीणों के साथ संवाद स्थापित करने का निर्णय लिया है।
रिपोर्टर: रमेश कुमार, ब्यूरो चीफ
स्थान: पीलीभीत, उत्तर प्रदेश
माध्यम: अब तक टीवी / प्रिंट मीडिया रिपोर्ट
