आज के दौर में टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना समय की मांग है, जिसमें नील हरित शैवाल (ब्लू ग्रीन एल्गी) के उत्पादन किसानों को किफायती दर पर जैविक उर्वरक उपलब्ध कराने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कृषि विभाग के उप संचालक श्री आशीष चंद्राकर ने बताया कि नीलहरित शैवाल, जिसे वैज्ञानिक रूप से सायनोबैक्टीरिया कहा जाता है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में अत्यंत उपयोगी है। यह प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से भूमि में पोषक तत्वों की पूर्ति करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके उपयोग से प्रति हेक्टेयर लगभग 25 से 30 किलोग्राम तक नाइट्रोजन की आपूर्ति संभव है, जिससे रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम पड़ती है। इससे न केवल किसानों की खेती की लागत में कमी आएगी, बल्कि वे जैविक खेती की ओर भी प्रेरित होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि जैव उर्वरकों के उपयोग से मृदा स्वास्थ्य बेहतर होता है। इस जैव उर्वरक का उपयोग विशेष रूप से धान की फसलों में लाभकारी है। जलभराव वाले खेतों में नील-हरित शैवाल तेजी से विकसित होता है, जिससे धान उत्पादन में वृद्धि और गुणवत्ता में सुधार होता है। इसके अतिरिक्त, यह क्षारीय एवं बंजर भूमि की उत्पादकता बढ़ाने में भी सहायक है।
जिले के ग्राम पथराटोला से श्रीमती लक्ष्मी पिस्दा, श्री चंद्रशेखर धाकडे, श्रीमती बलदीन बाई, श्री अलीत राम, श्री चैत राम, श्री दिलबर रावते, श्री श्रवण कुमार, श्रीमती यशोदा बाई, श्रीमती आशा धनकर, कारूटोला के श्री संजय भूआर्य एवं फरदडीह के श्री चेतन साहू इच्छुक किसानों के द्वारा अपने खेतों में 02 मीटर लम्बा 1.5 मीटर चैड़ा गढ्ढे तैयार कर नील हरित शैवाल का उत्पादन किया जा रहा है। नील हरित शैवाल का उत्पादन करने वाले कृषक अपने खेतों में रोपाई एवं वियासी के समय इसका उपयोग कर प्रति हेक्टेयर लगभग 25 से 30 किलोग्राम तक नाइट्रोजन की आपूर्ति करेंगे तथा धान की पैदावार में 8 से 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होगी। उन्होंने बताया कि जिले के इच्छुक किसान क्षेत्रीय ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों, कृषि विकास अधिकारियों एवं वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारियों से सम्पर्क कर नील हरित शैवाल उत्पादन की जानकारी प्राप्त कर सकते हंै।
