भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: स्थापना से आज तक संघर्ष और जनकल्याण की यात्रा
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे सशक्त, व्यापक और ऐतिहासिक राजनीतिक संस्था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रही है। कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक विचारधारा, एक आंदोलन और करोड़ों भारतीयों की आशाओं–आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति रही है। 28 दिसंबर 1885 को स्थापित कांग्रेस ने औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध संघर्ष से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक निर्णायक भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता के बाद भी कांग्रेस ने लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और समावेशी विकास के मूल्यों को आगे बढ़ाया। यह लेख कांग्रेस के जन्म से लेकर आज तक के संघर्ष, उपलब्धियों और विशेष रूप से दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों तथा किसानों के लिए किए गए कार्यों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है।
कांग्रेस की स्थापना और प्रारंभिक उद्देश्य (1885–1905)
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को मुंबई में हुई। इसके संस्थापक ए. ओ. ह्यूम थे, लेकिन इसकी आत्मा भारतीय जनता में निहित थी। दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नेताओं ने कांग्रेस को राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। प्रारंभिक दौर में कांग्रेस का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के भीतर संवैधानिक सुधारों की मांग करना, भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी दिलाना और जनता में राजनीतिक चेतना जगाना था।
इस काल में कांग्रेस ने जाति, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर एक साझा राष्ट्रीय पहचान गढ़ने का प्रयास किया। यद्यपि आंदोलन सीमित और शिक्षित वर्ग तक केंद्रित था, फिर भी यह भविष्य के व्यापक जनआंदोलन की नींव था।
उग्र राष्ट्रवाद और जनआंदोलन का उदय (1905–1918)
1905 में बंगाल विभाजन ने भारतीय राजनीति को झकझोर दिया। कांग्रेस के भीतर उग्र राष्ट्रवादियों का उदय हुआ, जिनमें बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल प्रमुख थे। स्वदेशी आंदोलन, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे कार्यक्रमों ने कांग्रेस को जनसाधारण से जोड़ा।
इसी काल में दादाभाई नौरोजी ने ‘ड्रेन थ्योरी’ के माध्यम से औपनिवेशिक शोषण को उजागर किया। कांग्रेस ने किसानों और कारीगरों की दुर्दशा को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया। यह वह समय था जब कांग्रेस एक अभिजात्य मंच से जनांदोलन की ओर बढ़ रही थी।
महात्मा गांधी का नेतृत्व और जनक्रांति (1918–1947)
महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक जनक्रांतिकारी संगठन बन गई। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन ने करोड़ों भारतीयों को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा। गांधीजी ने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह को राजनीतिक हथियार बनाया।
कांग्रेस ने इस दौर में दलितों के लिए अस्पृश्यता उन्मूलन, हरिजन उत्थान और सामाजिक सुधार के कार्यक्रम चलाए। गांधीजी ने स्वयं अछूत बस्तियों में जाकर सामाजिक समानता का संदेश दिया। जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने कांग्रेस को वैचारिक और संगठनात्मक मजबूती दी।
स्वतंत्रता और राष्ट्र निर्माण (1947–1964)
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। कांग्रेस के सामने देश के पुनर्निर्माण की चुनौती थी। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने लोकतांत्रिक संविधान लागू किया, जिसमें सामाजिक न्याय, समानता और मौलिक अधिकारों की गारंटी दी गई।
संविधान में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण, अल्पसंख्यकों के अधिकार और धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा कांग्रेस की दूरदृष्टि का परिणाम थी। भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन, सार्वजनिक क्षेत्र की स्थापना और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कांग्रेस ने आर्थिक आत्मनिर्भरता की नींव रखी।
दलितों और पिछड़ों के लिए कांग्रेस की भूमिका
कांग्रेस ने सामाजिक न्याय को अपने मूल एजेंडे में रखा। डॉ. भीमराव अंबेडकर को स्वतंत्र भारत का पहला कानून मंत्री बनाना कांग्रेस की ऐतिहासिक पहल थी। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण नीति, शिक्षा और रोजगार में अवसर, तथा सामाजिक भेदभाव के खिलाफ कानूनी संरक्षण कांग्रेस शासन में विकसित हुआ।
पिछड़ा वर्ग आयोगों की स्थापना, सामाजिक–आर्थिक पिछड़ेपन की पहचान और कल्याणकारी योजनाएं कांग्रेस की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। मंडल आयोग की प्रक्रिया की शुरुआत भी कांग्रेस काल में हुई, जिसने सामाजिक न्याय की दिशा को स्थायी बनाया।
अल्पसंख्यक समाज के लिए कांग्रेस का योगदान
भारत की बहुलतावादी संरचना में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भागीदारी कांग्रेस की प्राथमिकता रही है। संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार और समान नागरिकता की गारंटी कांग्रेस की नीति का परिणाम है।
शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यकों के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए गए। उर्दू, मदरसा शिक्षा, वक्फ बोर्ड और सांस्कृतिक संस्थानों को संरक्षण दिया गया। कांग्रेस ने सदैव सांप्रदायिकता के विरुद्ध और राष्ट्रीय एकता के पक्ष में भूमिका निभाई।
किसानों के लिए कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका
कांग्रेस का स्वतंत्रता आंदोलन ही किसान आंदोलनों से जुड़ा रहा। चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा आंदोलन और बारडोली सत्याग्रह ने किसानों को संगठित किया। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने भूमि सुधार, न्यूनतम समर्थन मूल्य, सिंचाई परियोजनाएं और सहकारी आंदोलन को बढ़ावा दिया।
हरित क्रांति के माध्यम से खाद्यान्न आत्मनिर्भरता, ग्रामीण विकास कार्यक्रम, मनरेगा जैसी योजनाएं और किसान ऋण माफी कांग्रेस सरकारों की किसान–हितैषी नीतियों का उदाहरण हैं। किसान कांग्रेस के माध्यम से संगठनात्मक स्तर पर किसानों की आवाज़ को मंच मिला।
इंदिरा गांधी युग और समाजवादी नीतियां
इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने समाजवादी नीतियों को मजबूती दी। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति, गरीबी हटाओ का नारा और 20 सूत्री कार्यक्रम ने गरीबों, किसानों और वंचितों को केंद्र में रखा।
1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भारत की भूमिका और 1974 के पोखरण परमाणु परीक्षण ने भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाई।
राजीव गांधी और आधुनिक भारत की नींव
राजीव गांधी ने तकनीक, दूरसंचार और कंप्यूटर क्रांति की शुरुआत की। पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त बनाकर स्थानीय लोकतंत्र को मजबूती दी गई। शिक्षा और युवाओं के लिए नई संभावनाएं खुलीं।
उदारीकरण, अधिकार आधारित राजनीति और हालिया दौर
नरसंह राव और डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक सुधारों ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान सूचना का अधिकार, मनरेगा, शिक्षा का अधिकार और खाद्य सुरक्षा कानून जैसे अधिकार आधारित कानून लागू हुए।
ये सभी कानून गरीबों, किसानों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाने वाले साबित हुए।
आज की कांग्रेस और भविष्य की दिशा
आज कांग्रेस लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए संघर्षरत है। कार्यकर्ता और नेता, जैसे राजेश कुमार सिद्धार्थ (प्रदेश उपाध्यक्ष, किसान कांग्रेस, 152 विधानसभा सिधौली, जनपद सीतापुर), जनसंपर्क के माध्यम से कांग्रेस की नीतियों को जन–जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।
निष्कर्ष
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास संघर्ष, त्याग और सेवा का इतिहास है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक कांग्रेस ने दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और किसानों के अधिकारों की रक्षा की है। कांग्रेस का स्थापना दिवस केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य के लिए संकल्प का अवसर है—एक ऐसे भारत का निर्माण, जहां समानता, न्याय और भाईचारा सर्वोपरि हो।
