फर्जी हस्ताक्षर के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत कई धाराएँ लागू होती हैं, जिनमें मुख्य रूप से धारा 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और धारा 471 (जाली दस्तावेज़ का असली के रूप में उपयोग करना) हैं। इसके अलावा, अपराध की गंभीरता और प्रकृति के आधार पर धारा 463 (जालसाजी की परिभाषा), धारा 464 (झूठा दस्तावेज़ बनाना), और धारा 465 (जालसाजी का दंड) भी लग सकती हैं।
धारा 463:
जालसाजी को परिभाषित करती है।
धारा 464:
यह बताती है कि कब एक दस्तावेज़ को जालसाजी माना जाएगा, जिसमें जाल हस्ताक्षर बनाना भी शामिल है।
धारा 465:
जालसाजी के अपराध के लिए दंड का प्रावधान करती है।
धारा 468:
धोखाधड़ी के इरादे से जालसाजी करने पर लागू होती है, जैसे कि किसी को धोखा देने के उद्देश्य से फर्जी हस्ताक्षर करना।
धारा 471:
इस धारा के तहत, यदि कोई व्यक्ति किसी जाली दस्तावेज़ को असली बताकर इस्तेमाल करता है, तो उस पर यह धारा लगती है। यह धारा, नकली हस्ताक्षर वाले दस्तावेज़ के इस्तेमाल पर भी लागू होती है।
धारा 197:
झूठे प्रमाण पत्र जारी करने या उस पर हस्ताक्षर करने पर लागू होती है।
