1 जुलाई 2024 से देश में ब्रिटिश कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) समाप्त कर दी गई और उसकी जगह भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) लागू हुई। यह नया कानून भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक, डिजिटल और नागरिक केंद्रित बनाने के उद्देश्य से बनाया गया है।
BNS में कुल 358 धाराएँ हैं, जबकि IPC में 511 धाराएँ थीं। इन नई धाराओं में अपराधों की परिभाषा, जांच की प्रक्रिया और सजा की अवधि को अधिक स्पष्ट, कड़ा और तकनीकी दृष्टि से अनुकूल बनाया गया है।
नई संहिता में हत्या, बलात्कार, धोखा, दंगे, आतंक, नारी उत्पीड़न, और साइबर अपराध जैसी प्रमुख धाराओं को नए सिरे से परिभाषित किया गया है। उदाहरण के लिए –
हत्या (BNS धारा 101) के लिए आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सजा का प्रावधान है।
बलात्कार (धारा 63-70) में सजा 10 वर्ष से लेकर मृत्युदंड तक हो सकती है, यदि पीड़िता नाबालिग है।
झूठा सबूत देना (धारा 227), भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी (धारा 318), और साइबर ठगी (धारा 111) को डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर दंडनीय बनाया गया है।
नया कानून “मॉब लिंचिंग (धारा 103)” को पहली बार स्पष्ट रूप से अपराध घोषित करता है। इसमें भीड़ द्वारा हत्या के दोषी पाए जाने पर आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक की सजा दी जा सकती है।
इसके अलावा, महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई नई धाराएँ जोड़ी गई हैं—जैसे पीछा करना, विवाह का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाना, ऑनलाइन उत्पीड़न आदि।
BNS में सजा और न्याय प्रक्रिया को डिजिटल साक्ष्य (CCTV, कॉल रिकॉर्ड, चैट, ईमेल आदि) पर आधारित करने की व्यवस्था की गई है, जिससे पुलिस और न्यायालय में पारदर्शिता बढ़ेगी।
यह भी व्यवस्था की गई है कि जांच 90 दिनों में पूरी हो और चार्जशीट समय पर दायर की जाए।
आरोपित को भी न्यायिक अधिकार और अपील का समान अवसर मिलेगा।
पुराने मामलों में अभी भी IPC लागू रहेगा, लेकिन 1 जुलाई 2024 के बाद दर्ज सभी नए मामलों में केवल BNS की धाराएँ लागू होंगी।
इस प्रकार, BNS भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था में ऐतिहासिक परिवर्तन है। यह कानून डिजिटल भारत, महिला सुरक्षा, तेज न्याय, और आतंक विरोधी नीति की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह अब प्रत्येक अपराध के लिए सजा, मंशा, और तकनीकी सबूत के आधार पर दंड तय करता है

