घघसरा
मानव शरीर ही ब्रज है, भक्ति उसकी शोभा । भक्ति रहित मनुष्य का जीवन पृथ्वी पर चलते फिरते मृग की भांति है। इसके अलावा कुछ नहीं। ब्रह्मा जैसी शरीर पाकर यदि भक्ति नहीं किया, तो कुछ नहीं किया।
उक्त- बातें वाराणसी धाम से पधारे आचार्य राघव ऋषि ने कही। वह घघसरा नगर पंचायत में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को कथा रसपान करा रहे थे।
कथा विस्तार करने हुए उन्होंने कहा कि- ब्रज के सभी गोप-गोपी बहुत सरल थे, उनके हृदय में भगवान् के प्रति निश्छल प्रेम था। कृष्ण के अलावा उनके हृदय में कोई चाह नहीं थी। यही कारण था कि- भगवान् को ब्रजभूम की पावन रज बहुत प्रिय लगती थी। बृजवासियों का सदा कल्याण हो सके, उन पर कोई संकट कभी न आवे, इसके लिए भगवान ने उन्हें पूर्ण रूप से सुरक्षित कर दिया और वहां से पधार कर द्वारिका की लीला की।
उक्त- अवसर पर रविंद्र,अरविंद , पन्नीलाल,राम शब्द, रामजीत, राजेंद्र, बबलू, विजेंद्र, हनुमान, ज्ञानचंद, सुधाकर , राजन ,अरविंद , महेश कसौधन, गौतम यादव समेत भारी संख्या में लोग मौजूद थे।
