गोरखपुर जिंदगी में कुछ पाना है, तो खुद पर ऐतबार रखना, सोच पक्की और कदमों में रफ्तार रखना इन्हीं पंक्तियों को जीवन मंत्र बनाकर आगे बढ़े शैलेश गुप्ता। खुद हीमोफीलिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए आज वे सैकड़ों मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बन चुके हैं। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हौसले, संघर्ष और सेवा की मिसाल है।
संघर्ष की शुरुआत
साल 2007 में शैलेश गुप्ता को हीमोफीलिया से जुड़ी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। उस समय गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में जीवनरक्षक दवाएं (फैक्टर) उपलब्ध नहीं थीं। हर छोटी-बड़ी चोट एक बड़ी चुनौती बन जाती थी। इलाज के लिए भटकना, असहनीय दर्द सहना और कई बार असहाय महसूस करना उनकी नियति बन गया था। लेकिन शैलेश ने हार नहीं मानी।
पीड़ा को बनाया ताकत अपनी पीड़ा को उन्होंने अपनी ताकत बना लिया। ठान लिया कि जो परेशानी उन्हें झेलनी पड़ी, वह किसी और मरीज को न झेलनी पड़े। साल 2010 में शैलेश गुप्ता ने 28 हीमोफीलिया मरीजों के साथ मिलकर अथक प्रयास शुरू किया। डॉक्टरों, चिकित्सा अधिकारियों और प्रशासन के सामने लगातार अपनी बात रखते रहे।
और आखिरकार, गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में सन् 2010 में जीवनरक्षक फैक्टर उपलब्ध कराने में सफलता मिली। यह सिर्फ एक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उन सभी मरीजों के लिए नई जिंदगी की शुरुआत थी। आज का योद्धा
आज शैलेश गुप्ता हीमोफीलिया वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष के रूप में मरीजों को हर संभव मदद पहुंचा रहे हैं। जरूरतमंदों को दवाइयां और इलाज दिलवाना, हीमोफीलिया जांच की सुविधा उपलब्ध कराना और हर समय मरीजों के साथ खड़े रहना उनकी दिनचर्या है। शासन-प्रशासन से लगातार संवाद कर वे मरीजों के लिए सुविधाएं बढ़वा रहे हैं।
शैलेश कहते हैं, अगर इरादा मजबूत हो, तो अपनी कमजोरी को भी ताकत बनाया जा सकता है। मुश्किलें हमें तोड़ने नहीं, मजबूत बनाने आती हैं। अपनी लड़ाई लड़ते-लड़ते हम दूसरों की जिंदगी भी बदल सकते हैं। सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता है। आज शैलेश गुप्ता सिर्फ एक मरीज नहीं, बल्कि सैकड़ों हीमोफीलिया परिवारों के लिए एक सच्चे योद्धा और मार्गदर्शक हैं।
