बांदा: लोकतंत्र की बुनियाद संवाद पर टिकी होती है, और संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है—स्वतंत्र पत्रकारिता। लेकिन जब व्यवस्था ही इस संवाद के रास्तों पर अवरोध खड़े करने लगे, तो यह केवल एक आदेश नहीं, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता पर सीधा हस्तक्षेप बन जाता है।जनपद बांदा में बेसिक शिक्षा अधिकारी अव्यक्त राम तिवारी द्वारा 16 अप्रैल 2026 को जारी पत्र (संख्या 667/75) ने ऐसा ही एक विवाद खड़ा कर दिया है। इस आदेश में विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों व स्टाफ को निर्देशित किया गया कि किसी भी पत्रकार को विद्यालय परिसर में तब तक प्रवेश न दिया जाए, जब तक वह सूचना विभाग द्वारा जारी पहचान पत्र प्रस्तुत न करे। साथ ही उल्लंघन की स्थिति में कार्यवाही की चेतावनी भी दी गई।यह आदेश सामने आते ही पत्रकारों में रोष की लहर दौड़ गई। बांदा प्रेस ट्रस्ट ने इसे “तुगलकी फरमान” करार देते हुए स्पष्ट कहा कि यह प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है। संगठन के पदाधिकारियों का मानना है कि किसी पत्रकार की पहचान केवल सरकारी कार्ड तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके संस्थान द्वारा जारी परिचय पत्र भी वैध और पर्याप्त होता है।पत्रकारों का प्रतिरोध: आवाज़ सड़कों से मंडलायुक्त कार्यालय तक लगभग दो दर्जन पत्रकारों ने एकजुट होकर मंडलायुक्त कार्यालय पहुंचकर ज्ञापन सौंपा और इस आदेश को निरस्त करने की मांग की। उन्होंने कहा कि सूचना विभाग की भूमिका को गलत तरीके से प्रस्तुत कर भ्रम फैलाया गया है, जो न केवल भ्रामक है बल्कि पत्रकारों के अधिकारों का हनन भी है।
ज्ञापन में मांग की गई—
प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए संबंधित अधिकारी के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई हो
अधिकारी को संविधान की प्रति देकर संवैधानिक अधिकारों से अवगत कराया जाए
भविष्य में ऐसी त्रुटियों से बचने हेतु पुनः प्रशिक्षण के लिए भेजा जाए पहचान की शर्त या नियंत्रण का प्रयास?यह विवाद केवल एक आदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या पत्रकारिता की वैधता अब केवल सरकारी पहचान पत्र से तय होगी?क्या बिना सरकारी स्वीकृति के सत्य तक पहुंचना अब वर्जित माना जाएगा?पत्रकारों का स्पष्ट मत है कि यह आदेश सुरक्षा के नाम पर नियंत्रण की कोशिश अधिक प्रतीत होता है। विद्यालय जैसे सार्वजनिक संस्थान, जहां पारदर्शिता अपेक्षित होती है, वहां इस प्रकार के प्रतिबंध कई शंकाओं को जन्म देते हैं।
कलम की ताकत बनाम प्रशासनिक आदेश बांदा प्रेस ट्रस्ट के संगठन प्रमुख अनिल सिंह गौतम ने तीखे शब्दों में कहा—“पत्रकार के लिए सबसे बड़ा हथियार उसकी कलम है—जो न रुकनी चाहिए, न झुकनी चाहिए, न अटकनी चाहिए और न ही भटकनी चाहिए। सच्ची पत्रकारिता वही है, जहां कलम सत्ता से नहीं, सत्य से संचालित होती है।”इस विरोध प्रदर्शन में ट्रस्टी अनिल तिवारी, एन. के. मिश्रा, जिलाध्यक्ष रमाकांत तिवारी, महासचिव अंशू गुप्ता, रोहित सिंह, ललित विश्वकर्मा, अविनाश चंद्र दीक्षित, सुशील मिश्रा, दिलीप जैन, गुड्डन खान सहित कई पत्रकार मौजूद रहे।
यह मामला केवल एक प्रशासनिक आदेश का विरोध नहीं, बल्कि उस मूल भावना की रक्षा का प्रयास है, जिस पर लोकतंत्र टिका है।यदि कलम पर शर्तें लगेंगी, तो सवाल भी सीमित हो जाएंगे—और जब सवाल सीमित होंगे, तो जवाबदेही भी सिमट जाएगी।अब देखना यह है कि प्रशासन इस विरोध को केवल असंतोष मानकर टाल देता है, या इसे एक गंभीर चेतावनी समझकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में कदम बढ़ाता है।

