आमोद कुमार
बांदा। जब पारा 45 डिग्री के पार पहुंच जाए और सरकारें हीटवेव से बचाव के लिए अलर्ट जारी कर रही हों, तब किसी गांव में पीने के पानी के लिए लोगों का भटकना केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का प्रतीक बन जाता है।विकासखंड कमासिन की ग्राम पंचायत भीती में इन दिनों कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिल रहा है, जहां भीषण गर्मी के बीच ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान हैं, जबकि सरकारी अभिलेखों में विकास कार्यों और मरम्मत पर हजारों-लाखों रुपये खर्च होने का दावा किया जा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार गांव के कई हैंडपंप महीनों से खराब पड़े हैं। गोगा के दरवाजे के पास, अप्पसर खान के घर के निकट तथा मदरसा स्कूल के समीप लगे हैंडपंप पानी देने के बजाय केवल उपेक्षा की कहानी सुना रहे हैं। परिणामस्वरूप महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे दूर-दराज के स्रोतों से पानी ढोने को मजबूर हैं। तेज धूप और लू के थपेड़ों के बीच पानी जुटाने की यह जद्दोजहद ग्रामीण जीवन को और कठिन बना रही है।ग्रामीणों का आरोप है कि समस्या नई नहीं है। कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन न पंचायत प्रतिनिधियों ने गंभीरता दिखाई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई ठोस पहल की। इससे लोगों में नाराजगी और अविश्वास दोनों बढ़ रहे हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते हैंडपंपों की मरम्मत कर दी जाती, तो आज गांव को इस संकट का सामना नहीं करना पड़ता।मामले का दूसरा पक्ष और भी गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों का आरोप है कि 8 मई 2026 को हैंडपंप मरम्मत और अन्य विकास कार्यों के नाम पर विभिन्न खातों में बड़ी रकम का भुगतान किया गया। आरोपों के मुताबिक एक ही दिन में 10 हजार, 40 हजार, 43 हजार 950 रुपये और 60 हजार रुपये तक की धनराशि अलग-अलग मदों में जारी की गई। पंचायत भवन में रंगाई-पुताई के नाम पर भी 14 हजार रुपये खर्च दर्शाए गए हैं। ऐसे में ग्रामीणों का सीधा सवाल है—यदि भुगतान हो चुका है, तो फिर हैंडपंप आज भी खराब क्यों हैं? यदि मरम्मत हुई है, तो उसका लाभ जनता तक क्यों नहीं पहुंचा?
गांव की समस्याएं केवल पेयजल संकट तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2021-22 में मनरेगा के तहत निर्मित नाला आज सफाई के अभाव में कचरे और गंदगी से पट चुका है। नाले से उठने वाली दुर्गंध आसपास के लोगों के लिए परेशानी का कारण बन गई है। ग्रामीणों का कहना है कि छोटे बच्चों और पशुओं के नाले में गिरने का खतरा भी लगातार बना रहता है। विकास के नाम पर बने ढांचे यदि रखरखाव के अभाव में खतरे का कारण बन जाएं, तो उनकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
ग्रामीणों ने पंचायत सचिवालय की स्थिति पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि सचिवालय के मीटिंग हॉल में भूसा भरा हुआ है, जिससे यह सरकारी भवन अपने मूल उद्देश्य से भटकता दिखाई देता है। यह स्थिति उस व्यवस्था की तस्वीर पेश करती है, जहां संस्थागत ढांचे मौजूद हैं, लेकिन उनका उपयोग जनहित के अनुरूप नहीं हो रहा।ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत कार्यकाल समाप्त होने से पहले कागजों में विकास दिखाकर सरकारी धन निकालने की होड़ मची हुई है। गांव में मूलभूत सुविधाओं की हालत खराब है, लेकिन दस्तावेजों में सब कुछ व्यवस्थित और पूर्ण दिखाया जा रहा है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न है।
जब इस संबंध में खंड विकास अधिकारी ओमप्रकाश द्विवेदी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि मामला उनके संज्ञान में नहीं है और जानकारी मिलने पर जांच कराई जाएगी। हालांकि ग्रामीणों के मन में बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जांच वास्तव में धरातल तक पहुंचेगी या फिर अन्य शिकायतों की तरह फाइलों के बोझ तले दबकर रह जाएगी।
गांव की प्यास केवल पानी की नहीं है, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता की भी है। अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराकर सच सामने लाता है या नहीं। क्योंकि विकास का वास्तविक मूल्य कागजों पर खर्च हुई रकम से नहीं, बल्कि जनता तक पहुंची सुविधा से तय होता है। यदि गांव का हैंडपंप सूखा है, तो विकास के दावों की चमक भी फीकी पड़ जाती है।

