रिपोर्ट सुधीर वर्मा अब तक न्याय
हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा बड़ी ही दूरदर्शी सोंच के साथ भारत के आम जनमानस को भारतीयता, समता, सहकारिता और प्राकृतिक न्याय के प्रबल पक्षों से समृद्ध रखने की जो प्रतिबद्धता दिखाई गई थी ,आज हमारा संविधान उसके जीवंत दस्तावेज के रूप में हमारे पास में सुरक्षित है, जो आज हमारा मार्गदर्शक एवं संरक्षक बना हुआ। आज हम अपने महान संविधान के
अनुच्छेद 25(2)(ब) सामाजिक सुधार, मंदिर प्रवेश और संविधान की ऐतिहासिक यात्रा पर एक विमर्श करने का लघु प्रयास करना चाहते हैं सो उसी क्रम में इस आलेख के माध्यम से आप तक यह साझा करने जा रहे हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सामान्यतः धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के रूप में जाना जाता है, किंतु इसका उपबंध 25(2)(ब) स्वतंत्र भारत के सामाजिक परिवर्तन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह प्रावधान राज्य को सामाजिक कल्याण एवं सुधार के लिए कानून बनाने तथा सार्वजनिक स्वरूप की हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों और समुदायों के लिए खोलने का अधिकार प्रदान करता है।
इस उपबंध को समझने के लिए हमें संविधान सभा से पहले के भारत की सामाजिक परिस्थितियों पर दृष्टि डालनी होगी। सदियों से भारतीय समाज में जातिगत विभाजन और अस्पृश्यता की प्रथा ने समाज के एक बड़े वर्ग को मंदिरों और सार्वजनिक धार्मिक स्थलों से दूर रखा। अनेक क्षेत्रों में दलितों और तथाकथित निम्न जातियों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार नहीं था। यह केवल धार्मिक प्रश्न नहीं था, बल्कि सामाजिक सम्मान और नागरिक समानता का प्रश्न बन चुका था।
बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से ही मंदिर प्रवेश आंदोलनों ने गति पकड़ी। केरल का वैकोम सत्याग्रह (1924-25), त्रावणकोर का मंदिर प्रवेश उद्घोषणा पत्र (1936) तथा देश के विभिन्न भागों में चले सामाजिक सुधार आंदोलनों ने इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना दिया। महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और अनेक समाज सुधारकों ने अस्पृश्यता तथा सामाजिक बहिष्कार का विरोध किया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब संविधान निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ, तब मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर व्यापक विचार-विमर्श भी हुआ।
बहुत ही संवेदन शीलता के साथ देश बनाने में प्रस्तुत सरदार वल्लभभाई पटेल जी की अध्यक्षता वाली सलाहकार समिति ने यह अनुभव किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार इतना व्यापक नहीं होना चाहिए कि उसके नाम पर सामाजिक सुधारों को रोका जा सके। और आगे चलकर इसी पृष्ठभूमि में यह सिद्धांत उभरा कि राज्य को सामाजिक सुधार हेतु हस्तक्षेप करने का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए।
इसके बाद ड्राफ्टिंग कमेटी, जिसके अध्यक्ष बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी थे, उन्होंने इस विचार को संविधान के मसौदे में स्थान दिया। संविधान सभा के समक्ष तत्कालीन ड्राफ्ट अनुच्छेद 19 में रखा गया जिसे वर्तमान अनुच्छेद 25 के रूप में जाना जाता है।
बाबा साहेब द्वारा
इस सुधार के समय संविधान सभा में बहस के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन आवश्यक है। धर्म के नाम पर यदि सामाजिक भेदभाव कायम रहता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
संविधान सभा में व्यापक सहमति बनी कि सार्वजनिक धार्मिक संस्थानों में प्रवेश किसी व्यक्ति की जाति, जन्म अथवा सामाजिक स्थिति के आधार पर प्रतिबंधित नहीं होना चाहिए। परिणामस्वरूप ड्राफ्ट अनुच्छेद 19(2)(ब) को स्वीकार किया गया, जो संविधान लागू होने पर अनुच्छेद 25(2)(ब) के रूप में स्थापित हुआ।
यदि हम अतीत में झांकें तो स्पष्ट हो जायेगा कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 25(2)(ब) किसी एक व्यक्ति की निजी पहल का परिणाम नहीं था अपितु स्वतंत्रता पूर्व के विभिन्न सामाजिक आन्दोलनों का प्रभाव और उनकी प्रेरणा ने इसे गतिशीलता प्रदान की थी।
यदि हम इसकी ऐतिहासिक जड़ों की पड़ताल करेंगे तो पायेंगे कि आजादी पूर्व किये गये अनेकों सामाजिक सुधार आंदोलन इसकी वैचारिक आधारशिला में हैं जोकि समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की आवश्यकता अनिवार्यता को लेकर किये गये थे। हाँ
इसकी संस्थागत सिफारिशें सरदार पटेल की अध्यक्षता वाली समिति से अवश्य आईं थीं जिसे आगे चलकर संविधान सभा के समक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर जी ने प्रस्तुत किया।
वास्तव में अनुच्छेद 25(2)(ब) भारतीय संविधान की उस दूरदर्शिता का प्रतीक है जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता को संरक्षित रखते हुए सामाजिक समानता को सर्वोच्च महत्व दिया गया। यह प्रावधान केवल मंदिर प्रवेश का संवैधानिक आधार नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक संघर्ष की स्मृति भी है जिसके माध्यम से भारतीय समाज ने समान अधिकारों और सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया।
अनुज वर्माविकल
लक्ष्य संधान
