ओडिशा के क्योंझर जिले के घुंघी गांव में नटबर जुआंग का परिवार बेहद मुश्किल हालात में जिंदगी गुजार रहा है। नटबर और उनकी पत्नी कुंद की तीन बेटियां दिव्यांग हैं और चलने-फिरने में असमर्थ हैं।
ओडिशा के क्योंझर जिले के बांसपाल ब्लॉक के घुंघी गांव से सामने आई एक परिवार की कहानी दिल को झकझोर देने वाली है। यहां नटबर जुआंग और उनकी पत्नी कुंद जुआंग अपनी तीन दिव्यांग बेटियों के साथ बेहद मुश्किल हालात में जिंदगी गुजार रहे हैं। जिस उम्र में बच्चों को खेलना, हंसना और अपने भविष्य के सपने देखने चाहिए, उस उम्र में नटबर की बेटियां अपनी दिव्यांगता के कारण घर की चारदीवारी तक सीमित हैं। इनमें कोई ठीक से चल नहीं पाती, तो कोई अपने रोजमर्रा के काम खुद नहीं कर पाती।न अपनी जमीन, न नियमित आमदनी
नटबर जुआंग के परिवार में कुल छह सदस्य इस समय एक छोटे से घर में रहते हैं। परिवार के पास खेती करने के लिए अपनी जमीन नहीं है और कोई नियमित आमदनी का जरिया भी नहीं है। नटबर और उनकी पत्नी कुंद पहले मजदूरी करके परिवार चलाते थे, लेकिन उम्र बढ़ने के कारण अब उनके लिए मजदूरी करना भी मुश्किल हो गया है। ऐसे में परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें सरकारी मदद और मिलने वाले चावल पर काफी हद तक निर्भर हैं।
परिवार आदिवासी जनजाति से जुड़ा हुआ है, जिसके कारण उन्हें सरकार की ओर से 35 किलो चावल मुफ्त मिलता है। परिवार का कहना है कि इसी चावल के सहारे घर का गुजारा चल रहा है। नटबर जुआंग की कुल पांच बेटियां हैं। इनमें से दो बेटियों की शादी हो चुकी है, जबकि तीन बेटियां दिव्यांगता के साथ जीवन जी रही हैं।
दूसरे बच्चे जब बाहर खेलते और दौड़ते हैं, तब ये तीन बहनें उन्हें दूर से देखती हैं। उनकी जिंदगी की मुश्किलें उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती हैं। इन बेटियों के लिए घर से बाहर निकलना भी किसी चुनौती से कम नहीं है। पैरों से चलने में असमर्थ होने के कारण उन्हें आने-जाने के लिए जमीन पर घिसटकर या किसी तरह आगे बढ़ना पड़ता है। गांव की कच्ची, ऊबड़-खाबड़ और कीचड़ भरी सड़कें उनकी परेशानी को और बढ़ा देती हैं। ऐसे हालात में स्कूल जाना, इलाज के लिए बाहर जाना या अपनी किसी जरूरी जरूरत के लिए घर से निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है।
सरकारी नियमों के अनुसा लोगों के लिए पेंशन, घर, चावल और दूसरी सुविधाओं का प्रावधान है। लेकिन नटबर जुआंग के परिवार की स्थिति देखकर सवाल उठता है कि इन योजनाओं का लाभ जरूरत के मुताबिक परिवार तक पहुंच पा रहा है या नहीं।
तीन बेटियों के लिए मिले सिर्फ दो दिव्यांग वाहन
परिवार के मुताबिक तीन दिव्यांग बेटियों के लिए सरकार की ओर से सिर्फ दो दिव्यांग वाहन मिले हैं। इलाज के लिए करीब 20 हजार रुपये की आर्थिक मदद भी मिली है। लेकिन तीन दिव्यांग बेटियों के लंबे समय तक चलने वाले इलाज और देखभाल के लिए क्या 20 हजार रुपये पर्याप्त हैं? यही चिंता परिवार को लगातार परेशान कर रही है।
घुंघी गांव में जुआंग समुदाय और आदिवासी जनजातियों के विकास के लिए संबंधित विकास संस्थाएं भी काम कर रही हैं। इसके बावजूद नटबर जुआंग का परिवार आज भी बेहद कठिन परिस्थितियों में रह रहा है। परिवार के पास अपना सुरक्षित घर नहीं है। तीन दिव्यांग बेटियों की जरूरतों के मुताबिक पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं और माता-पिता भी उम्र के इस पड़ाव पर नियमित रूप से काम करने की स्थिति में नहीं हैं। एक तरफ तीन बेटियों की देखभाल की जिम्मेदारी है और दूसरी तरफ माता-पिता की अपनी बढ़ती उम्र। ऐसे में परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल बेटियों के भविष्य को लेकर है।
बुजुर्ग माता-पिता के सामने बेटियों के भविष्य की चिंता
मामला सामने आने के बाद क्योंझर के मुख्य विकास अधिकारी और जिला परिषद के कार्यकारी अधिकारी कुमार नाग भूषण ने कहा है कि प्रशासन की ओर से परिवार को तत्काल बढ़ी हुई पेंशन, चावल और अन्य जरूरी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाएगी। प्रशासन के इस आश्वासन से परिवार को कुछ राहत की उम्मीद जरूर जगी है। नटबर और कुंद के लिए आज सबसे बड़ी चिंता सिर्फ आज का गुजारा नहीं, बल्कि अपनी बेटियों का भविष्य है। जब तक माता-पिता काम कर सकते थे, किसी तरह परिवार की जिम्मेदारी उठाते रहे। लेकिन अब उम्र बढ़ने के साथ उनके लिए काम करना भी मुश्किल हो गया है।
ऐसे में उनके मन में एक ही सवाल है कि जब वे दोनों नहीं रहेंगे, तब इन तीन दिव्यांग बेटियों का क्या होगा? परिवार को एक सुरक्षित घर की जरूरत है। बेटियों के लिए जरूरी इलाज और देखभाल की जरूरत है। उनकी दिव्यांगता के अनुसार, उचित सरकारी सहायता और नियमित खाद्य सुरक्षा की भी जरूरत है। सरकारी योजनाएं और सहायता अगर सही तरीके से इस परिवार तक पहुंचती हैं, तो इन तीन बहनों की जिंदगी में उम्मीद की एक नई किरण आ सकती है।
फिलहाल घुंघी गांव का यह परिवार सरकारी मदद का इंतजार कर रहा है। माता-पिता की आंखों में अपनी बेटियों के भविष्य को लेकर चिंता है और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उन्हें सुरक्षित छत, जरूरी इलाज और सम्मान के साथ जीवन जीने का सहारा आखिर कब मिलेगा?

