“बहराइच में मौत का कारोबार: शंकरपुर चौराहे पर झोलाछाप डॉक्टरों का राज, स्वास्थ्य विभाग की नींद गहरी”
जहां सरकार करोड़ों खर्च कर रही है स्वास्थ्य सेवाओं पर, वहीं सिस्टम की मिलीभगत से झोलाछाप डॉक्टर गरीबों की जिंदगी से खेल रहे हैं।
सम्पादकीय विशेष रिपोर्ट
अब तक टीवी न्यूज़ चैनल — जिला क्राइम ब्यूरो, अदहम खान की रिपोर्ट
भूमिका — एक तस्वीर जिसने खोल दी बहराइच की सच्चाई
यह तस्वीर किसी दूरदराज पहाड़ी या पिछड़े इलाके की नहीं, बल्कि जनपद बहराइच के रिसिया ब्लॉक और थाना रिसिया क्षेत्र के ग्राम पंचायत रायपुर कबुला के पास शंकरपुर चौराहे की है।
तस्वीर में साफ दिखाई देता है — एक व्यक्ति सफेद कोट में मरीज का इलाज कर रहा है। उसके पीछे दवाइयों से भरा मेडिकल स्टोर है, और कैमरे में उसकी जुबान से निकला सच – “हाँ, मैं झोलाछाप डॉक्टर हूँ।”
यह दृश्य केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की पोल खोल देता है — एक ऐसा तंत्र जो जनता के स्वास्थ्य की रक्षा करने के बजाय, उसे मौत के मुहाने पर छोड़ देता है।
स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी — जब मौत सामान्य हो गई
उत्तर प्रदेश सरकार हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करती है ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर।
कागजों में योजनाएँ चमकती हैं — मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना, आयुष्मान भारत, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सुदृढ़ीकरण, दवा वितरण अभियान — लेकिन जब कैमरा जमीनी हकीकत दिखाता है, तो तस्वीरें किसी भयावह सच्चाई की गवाही बन जाती हैं।
जनपद बहराइच में स्वास्थ्य विभाग का हाल ऐसा है कि जहां एक तरफ सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है, वहीं दूसरी तरफ बिना डिग्री और बिना मान्यता वाले लोग खुलेआम मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
इन झोलाछाप डॉक्टरों के पास न तो मेडिकल शिक्षा है, न क्लिनिकल अनुभव, न ही लाइसेंस — लेकिन फिर भी यह लोग इंजेक्शन लगा रहे हैं, दवाइयाँ बाँट रहे हैं और जानलेवा गलत इलाज कर रहे हैं।
अल्ताफ सिद्दीकी: एक नाम, जो बन गया प्रतीक
रिसिया ब्लॉक के शंकरपुर चौराहे पर स्थित अल्ताफ सिद्दीकी का मेडिकल स्टोर अब इस पूरे मामले का प्रतीक बन गया है।
जब “अब तक टीवी” के पत्रकार ने संचालक से फोन पर बात की, तो उसने साफ कहा —
“हाँ, मैं झोलाछाप डॉक्टर हूँ।”
यह स्वीकारोक्ति किसी अपराध की नहीं, बल्कि एक व्यवस्था की विफलता की साक्षी है।
क्योंकि प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि अल्ताफ सिद्दीकी कौन है — बल्कि यह है कि उसके जैसे सैकड़ों अल्ताफ सिद्दीकी पूरे जिले में क्यों और कैसे खुलेआम इलाज कर रहे हैं?
कटघरा भगवानपुर से लेकर भोंदू चौराहा — हर गली में ‘मौत का क्लिनिक’
यह मामला अकेला नहीं।
कुछ समय पहले कटघरा भगवानपुर गांव के पास भोंदू चौराहे पर भी ऐसे ही झोलाछाप डॉक्टरों के इलाज करने की खबरें सामने आई थीं। मीडिया ने खबर चलाई, मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को सूचित किया गया, लेकिन परिणाम?
कोई कार्यवाही नहीं।
भोंदू चौराहे की तरह अब शंकरपुर चौराहा भी झोलाछाप डॉक्टरों का केंद्र बन चुका है। हर तीसरे मेडिकल स्टोर पर इलाज के नाम पर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है।
यह सिलसिला रुकता नहीं — क्योंकि जो रुकना चाहिए, वह सोया हुआ है: प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग।
प्रशासन की चुप्पी — भ्रष्टाचार की परतें गहरी
स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग के कुछ अधिकारी इन अवैध क्लीनिकों से मोटी रकम लेकर आँख मूँद लेते हैं।
अगर ऐसा नहीं है, तो यह झोलाछाप डॉक्टर आखिर किसके संरक्षण में काम कर रहे हैं?
शासन के सख्त आदेशों के बावजूद न तो छापेमारी होती है, न ही किसी के खिलाफ एफआईआर।
प्रश्न यह भी है कि अगर किसी मरीज की जान चली जाती है, तो ज़िम्मेदार कौन होगा?
कागजों में सब कुछ दुरुस्त, जमीनी स्तर पर सब लापरवाह — यह बहराइच का सच है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी से संपर्क नहीं — जवाबदेही गायब
जब इस मामले पर “अब तक टीवी” के जिला क्राइम ब्यूरो प्रमुख अदहम खान ने मुख्य चिकित्सा अधिकारी से फोन पर बात करने की कोशिश की, तो संपर्क नहीं हो सका।
प्रशासनिक जिम्मेदारी का यह रवैया दिखाता है कि कैसे जिले का स्वास्थ्य तंत्र जवाबदेही से बचता है।
एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार निर्देश देते हैं कि “झोलाछाप डॉक्टरों पर सख्त कार्रवाई की जाए”,
लेकिन दूसरी तरफ बहराइच में सीएमओ कार्यालय की चुप्पी इस आदेश का मजाक बना रही है।
जनता की आवाज — “हमारी जान की कीमत कोई नहीं समझता”
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब वे सरकारी अस्पताल जाते हैं, तो डॉक्टर नहीं मिलते; और जब निजी क्लीनिक में जाते हैं, तो झोलाछाप डॉक्टर इलाज करते हैं।
कोई विकल्प नहीं बचता — गरीब मरीज मजबूर होकर इलाज करवाता है, चाहे दवा से ठीक हो या ज़हर से।
एक वृद्ध ग्रामीण ने कहा —
“हमें नहीं पता कौन असली डॉक्टर है, कौन नकली। हम तो बस दवा लेते हैं ताकि दर्द कम हो जाए।”
यह वाक्य एक जनपद नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विवशता का प्रतीक है।
सरकारी घोषणाएँ बनाम ज़मीनी सच्चाई
कागजों में बहराइच में दर्जनों स्वास्थ्य उपकेंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सक्रिय हैं।
परंतु हकीकत यह है कि ज्यादातर केंद्र या तो बिना डॉक्टर के हैं या बिना दवा के।
जब जनता को सरकारी केंद्रों से राहत नहीं मिलती, तो वह झोलाछाप डॉक्टरों के जाल में फँस जाती है।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि स्वास्थ्य विभाग की विफलता ने झोलाछाप डॉक्टरों को जन्म दिया है।
जहां सरकार की पहुँच खत्म होती है, वहां झोलाछाप का साम्राज्य शुरू होता है।
नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी — सवालों के घेरे में तंत्र
क्या प्रशासन यह स्वीकार करेगा कि उसकी नाक के नीचे अवैध चिकित्सा केंद्र चल रहे हैं?
क्या स्वास्थ्य विभाग यह मानेगा कि उसने निगरानी तंत्र को विफल होने दिया?
अगर नहीं — तो फिर इन झोलाछाप डॉक्टरों का अस्तित्व कैसे कायम है?
यह मामला सिर्फ एक चिकित्सक या एक मेडिकल स्टोर का नहीं है —
यह उस सोच का परिणाम है, जो गरीब की जान को सस्ती समझती है।
पत्रकारीय दृष्टिकोण — जब मीडिया ही अंतिम उम्मीद बने
जब सरकारी व्यवस्था विफल हो जाती है, तो मीडिया ही समाज का प्रहरी बनता है।
“अब तक टीवी न्यूज़ चैनल” की यह रिपोर्ट केवल एक सूचना नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है —
कि अगर आज भी प्रशासन नहीं जागा, तो कल बहराइच की गलियों में हर घर एक त्रासदी का नाम बन जाएगा।
पत्रकार अदहम खान का प्रयास केवल खबर छापना नहीं, बल्कि सत्ता को आईना दिखाना है।
क्योंकि सच्ची पत्रकारिता वही है, जो जनता की आवाज़ बनकर सवाल पूछे, और सत्ता को जवाबदेह बनाए।
संविधान, कानून और जनस्वास्थ्य — तीनों की अनदेखी
भारत का संविधान नागरिकों को जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार देता है।
लेकिन जब झोलाछाप डॉक्टर जनता का इलाज करते हैं, तो यह केवल चिकित्सा अपराध नहीं, बल्कि संवैधानिक उल्लंघन भी है।
स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी इस अपराध की सहभागी बन जाती है।
“राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम” (NMC Act) के तहत बिना पंजीकरण इलाज करना दंडनीय अपराध है —
लेकिन बहराइच में इस कानून की धज्जियाँ उड़ रही हैं।
जनपक्षीय विश्लेषण — जब सिस्टम गरीब के खिलाफ खड़ा होता है
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि जिसे सरकार का सबसे अधिक संरक्षण मिलना चाहिए — वही गरीब व्यक्ति सबसे असुरक्षित है।
डॉक्टरों की कमी, भ्रष्ट व्यवस्था, और प्रशासनिक उपेक्षा ने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया है जिसमें झोलाछाप डॉक्टर “जरूरत” बन गए हैं।
सवाल सिर्फ कार्रवाई का नहीं है, सवाल नीति का है।
अगर सरकार गांवों में स्वास्थ्य केंद्रों को वास्तव में क्रियाशील बना दे,
तो झोलाछाप डॉक्टरों की दुकानें अपने आप बंद हो जाएँगी।
निष्कर्ष — बहराइच का दर्द, जो पूरे प्रदेश की चेतावनी है
बहराइच की यह घटना एक जिले की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे की वास्तविक तस्वीर है।
यह बताती है कि जब तक प्रशासनिक ईमानदारी नहीं आती, तब तक करोड़ों का बजट भी जनता को सुरक्षा नहीं दे सकता।
अब यह देखने की बात है कि क्या इस रिपोर्ट के बाद स्वास्थ्य विभाग जागता है,
या फिर यह मामला भी फाइलों के अंधेरे में दफन हो जाता है।
**“अब तक टीवी न्यूज़ चैनल” से —
जिला क्राइम ब्यूरो, बहराइच
रिपोर्ट: अदहम खान
