ब्यूरो चीफ सुजीत कुमार कानपुर नगर
भारतीय ज्ञान परंपरा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी विभिन्न तकनीकी सत्रों में विद्वानों ने रखे अपने विचार
आयुर्वेद, योग, संस्कृत और भारतीय शोध पर विशेषज्ञों ने बताया—“आज भी प्रासंगिक है हमारी प्राचीन परंपरा”
कानपुर, दिल्ली, मेरठ और हरिद्वार के विद्वानों ने दिए महत्वपूर्ण शोध–संदेश
भारतीय ज्ञान परंपरा—स्वर्णिम अतीत और उज्ज्वल भविष्य—इसी विषय पर आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन विभिन्न तकनीकी सत्रों में देशभर से आए विद्वानों ने अपने-अपने विचार रखे।कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही प्रो. सीमा वर्मा ने कहा कि इस संगोष्ठी से छात्रों को भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं को गहराई से समझने का अवसर मिलता है।तृतीय तकनीकी सत्र में प्रो. वाचस्पति मिश्र ने भारतीय ज्ञान परंपरा में संस्कृत भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं ने हमेशा विश्व को दिशा दी है।
योग विभाग, गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार के डॉ. उद्यम सिंह ने वेदों की प्राचीनता और योग की सार्वभौमिकता को समझाते हुए बताया कि योगाभ्यास व्यक्ति की चेतना को सार्वभौमिक चेतना से जोड़ता है।
चतुर्थ तकनीकी सत्र का संचालन प्रो. सुमन ने किया। इस सत्र की वक्ता प्रो. अर्चना रानी ने आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्राचीन रसायनिक विज्ञान की आज भी मौजूद प्रासंगिकता पर जोर दिया। वहीं शिक्षाविद् डॉ. जितेन्द्र सिंह गोयल ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर हो रहे शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।भारतीय ज्ञान परंपरा पर आयोजित यह संगोष्ठी न सिर्फ शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी रही, बल्कि युवाओं को भी अपनी जड़ों से जुड़ने का प्रेरक संदेश दे गई।

