जस्टिस सूर्यकांत: खेतों से कोर्टरूम तक, भारत के 53वें CJI का प्रेरक सफर
भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) बने जस्टिस सूर्यकांत का जीवन संघर्ष, परिश्रम और अनुशासन का अनूठा उदाहरण माना जाता है। हरियाणा के एक छोटे से गांव से शुरू हुई उनकी यात्रा सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंची। एक न्यायविद होने के साथ-साथ वे कवि, पर्यावरण प्रेमी और लेखक भी हैं।
परिवार और प्रारंभिक जीवन
जस्टिस सूर्यकांत का जन्म हरियाणा के एक किसान परिवार में हुआ। वर्ष 1980 में उनका विवाह सविता शर्मा से हुआ, जो लेक्चरर रहीं और बाद में एक कॉलेज की प्रिंसिपल के रूप में सेवानिवृत्त हुईं। दंपत्ति की दो बेटियां हैं, जो कानून में स्नातकोत्तर (मास्टर डिग्री) कर रही हैं और अपने पिता की तरह न्यायपालिका में योगदान देने की तैयारी में हैं।
कानून की पढ़ाई और करियर की शुरुआत
उन्होंने 1984 में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक से एलएलबी की डिग्री हासिल की। उसी वर्ष हिसार जिला न्यायालय में वकालत की शुरुआत की।
एक वर्ष बाद 1985 में वे चंडीगढ़ पहुंचे और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस शुरू की।
न्यायाधीश रहते हुए भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और 2011 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कानून में स्नातकोत्तर (LL.M.) की डिग्री प्राप्त की।
38 वर्ष की आयु में हरियाणा के सबसे युवा महाधिवक्ता
सात जुलाई 2000 को जस्टिस सूर्यकांत हरियाणा के सबसे युवा महाधिवक्ता बने। इसके बाद उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा मिला।
वर्ष 2004 में वे पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त किए गए।
लगभग 14 वर्षों की सेवा के बाद अक्टूबर 2018 में वे हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने और 24 मई 2019 को उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया।
कवि, पर्यावरण प्रेमी और किसान
कॉलेज के दिनों में लिखी उनकी कविता ‘मेंढ पर मिट्टी चढ़ा दो’ काफी चर्चित हुई थी।
पर्यावरण के प्रति उनकी गहरी रुचि है। अपने गांव के तालाब के जीर्णोद्धार के लिए उन्होंने निजी रूप से आर्थिक सहयोग दिया और उसके चारों ओर पौधारोपण भी करवाया।
उन्हें खेती-बाड़ी का भी शौक है और अक्सर अपने गांव जाकर खेती से जुड़े कार्यों में हिस्सा लेते हैं।
लेखन और पत्रकारिता से लगाव
पत्रकारिता उन्हें हमेशा से आकर्षित करती रही है। वे किसी भी विषय की गहराई और मूल कारण तक पहुंचने को पत्रकारिता का श्रेष्ठ गुण मानते हैं और स्वयं को ‘दिल से पत्रकार’ कहते हैं।
उन्होंने वर्ष 1988 में ‘Administrative Geography of India’ नामक पुस्तक लिखी, जिसे अकादमिक जगत में सराहना मिली।
विवादों से भी रहा सामना
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में कार्यरत रहने के दौरान जस्टिस सूर्यकांत पर कुछ गंभीर आरोप भी लगे।
2012 में एक रियल एस्टेट एजेंट ने करोड़ों रुपये के लेनदेन में शामिल होने का दावा किया था।
2017 में पंजाब के एक कैदी ने जमानत के बदले रिश्वत लेने की शिकायत दर्ज की थी।
हालांकि, सभी आरोप जांच में सिद्ध नहीं हो सके और मामले आगे नहीं बढ़ पाए।
निष्कर्ष
जस्टिस सूर्यकांत का जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन मेहनत और लगन ने उन्हें देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के शीर्ष पद तक पहुंचाया। अपनी बौद्धिक क्षमता, सरल व्यक्तित्व, पर्यावरण प्रेम और पारदर्शिता के कारण वे भारतीय न्यायपालिका में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
