बांदा। सड़क हादसे कभी-कभी केवल दुर्घटना नहीं होते, वे व्यवस्था की सच्चाई भी उजागर कर देते हैं। नरैनी तहसील के कालिंजर थाना क्षेत्र में घटी एक दर्दनाक घटना ने आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। समय पर एंबुलेंस न पहुंचने के कारण एक महिला की जिंदगी खत्म हो गई, जबकि एक किशोर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है।
मिली जानकारी के अनुसार कालिंजर थाना क्षेत्र के छतैनी गांव निवासी बुद्धिविलास यादव (51) अपनी पत्नी शेखा देवी (48) को बाइक से लेकर रिश्तेदारी में जा रहे थे। जब वे सढ़ा गांव के पास स्थित पानी की टंकी के निकट मुख्य मार्ग से गुजर रहे थे, तभी अचानक सामने एक साइकिल सवार बालक आ गया। उसे बचाने की कोशिश में बाइक अनियंत्रित होकर सड़क किनारे खंती में जा गिरी।इस हादसे में बाइक के पीछे बैठी शेखा देवी दूर जा गिरीं और उनके सिर में गंभीर चोट लग गई, जबकि बुद्धिविलास यादव को हल्की चोटें आईं। वहीं साइकिल सवार प्रांशु (16) पुत्र जगदीश, निवासी सढ़ा गांव भी गंभीर रूप से घायल हो गया।
दुर्घटना के बाद परिजनों ने तत्काल डायल 108 एंबुलेंस सेवा को फोन किया। आश्वासन तो बार-बार मिला, लेकिन एंबुलेंस मौके तक नहीं पहुंची। घायल शेखा देवी सड़क किनारे अचेत पड़ी रहीं और समय धीरे-धीरे उनकी सांसों पर भारी पड़ता गया। अंततः अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में उनकी मौत हो गई। यह मौत केवल एक हादसे की नहीं, बल्कि समय पर मदद न मिल पाने की त्रासदी भी बन गई।
उधर गंभीर रूप से घायल किशोर प्रांशु को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां से हालत नाजुक होने पर उसे मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया। लेकिन यहां भी वही कहानी दोहराई गई—एंबुलेंस करीब डेढ़ घंटे तक नहीं पहुंची।
बताया जाता है कि समाजसेवी उमेश तिवारी ने मुख्य चिकित्साधिकारी से फोन पर संपर्क किया, तब यह जानकारी मिली कि एंबुलेंस को परीक्षा केंद्र की ड्यूटी में लगाया गया है। इसके बाद बहेरी से एंबुलेंस भेजी गई और तब जाकर घायल किशोर को मेडिकल कॉलेज पहुंचाया जा सका।इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या आपातकालीन सेवा का उद्देश्य परीक्षा ड्यूटी से कम महत्वपूर्ण है? क्या किसी घायल की सांसें प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच यूं ही अटकती रहेंगी?शेखा देवी की मौत के बाद परिवार में कोहराम मचा हुआ है, वहीं क्षेत्र में लोगों के बीच आक्रोश भी साफ दिखाई दे रहा है। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें समय पर मदद न मिलना कभी-कभी जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय कर देता है।
