बांदा। बुंदेलखंड की झुलसाती गर्मी जहाँ मनुष्य के लिए ही कठिन परीक्षा बन जाती है, वहीं निरीह गोवंशों के लिए यह जीवन-मरण का संकट बनकर सामने आ रही है। जसपुरा ब्लॉक की विभिन्न गौशालाओं की स्थिति इस संवेदनहीनता का मार्मिक और चिंताजनक चित्र प्रस्तुत करती है, जहाँ संरक्षण के नाम पर उपेक्षा और अव्यवस्था का कड़वा सच उजागर हो रहा है।विश्व हिंदू महासंघ गौरक्षा के जिला अध्यक्ष महेश कुमार प्रजापति द्वारा किए गए स्थलीय निरीक्षण में जो तथ्य सामने आए, वे केवल व्यवस्थागत कमजोरी नहीं, बल्कि मानवीय उत्तरदायित्व के क्षरण की कहानी कहते हैं। ग्राम पंचायत झंझरी पुरवा स्थित अस्थाई गौशाला में तीन गोवंश जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते मिले—निस्सहाय, बीमार और उपेक्षित। एक अन्य गोवंश गड्ढे में मृत अवस्था में मिला, जबकि आसपास बिखरे कंकाल और हड्डियाँ इस बात की मूक गवाही दे रहे थे कि यहाँ जीवन का संरक्षण नहीं, बल्कि धीरे-धीरे समाप्ति हो रही है।स्थिति का सबसे गंभीर पक्ष यह है कि जिन गौशालाओं में कभी 98 गोवंश संरक्षित थे, वहाँ आज मात्र 53 शेष हैं। यह मात्र आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि एक गूढ़ प्रश्न है—क्या यह कमी प्राकृतिक मृत्यु का परिणाम है, या फिर कहीं व्यवस्था की खामियों और अनदेखी का दुष्परिणाम? यदि गोवंशों की मृत्यु हुई है, तो उसका लेखा-जोखा कहाँ है? और यदि वे गायब हुए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी किसकी है?ग्राम पंचायत जसपुरा की स्थाई गौशाला में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ कर्मचारियों के अनुसार लगभग पंद्रह दिनों से गोवंशों को नियमित भोजन तक नहीं दिया जा रहा। उन्हें खुले में चरने के लिए छोड़ देना व्यवस्था का विकल्प नहीं, बल्कि कर्तव्य से पलायन का प्रमाण है। भोजन, पानी और छाया जैसी बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित ये मूक प्राणी मानो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।इसी क्रम में ग्राम पंचायत रामपुर की अस्थाई गौशाला का दृश्य अत्यंत वेदनापूर्ण है, जहाँ मात्र 40 गोवंश ही उपस्थित मिले और उनकी स्थिति इतनी दयनीय थी कि वे भूख से व्याकुल होकर जमीन तक चाटने को विवश दिखे। यह दृश्य केवल पशु-पीड़ा का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है, जिसने संरक्षण के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई है।
यह पूरा परिदृश्य एक व्यापक प्रश्न खड़ा करता है—क्या गौशालाएँ वास्तव में संरक्षण केंद्र हैं या मात्र कागजी आंकड़ों का हिस्सा बनकर रह गई हैं? यदि शासन की योजनाएँ धरातल पर इस प्रकार दम तोड़ रही हैं, तो उनके उद्देश्य और क्रियान्वयन के बीच की खाई को पाटना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।महेश कुमार प्रजापति ने प्रशासन से मांग की है कि भीषण गर्मी को देखते हुए गौशालाओं में चारा, स्वच्छ पानी और चिकित्सकीय सुविधाओं की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। साथ ही, घटती संख्या और संदिग्ध परिस्थितियों में हो रही गोवंशों की मौतों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
निस्संदेह, यह केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है गौशालाओं की यह दुर्दशा हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम वास्तव में उन मूल्यों का पालन कर रहे हैं, जिनकी हम अक्सर बात करते हैं, या फिर वे केवल शब्दों तक सीमित होकर रह गए हैं।
