कथा का रसपान कराते हुए कहा जिस इंसान को जितनी अधिक इच्छा होती है वह उतना ही परेशान रहता है।इसलिए परमात्मा ने जो दिया है मनुष्य को उसी में संतोष करना चाहिए वहीं मनुष्य जीवन में सुखी रहता है।आगें कहा की यह संसार दुःखालय है।इसलिए मनुष्य को कभी सुख की कामना नहीं करनी चाहिए।क्योंकि संसार में कामनाएं ही मनुष्य को अंधा बना देती है।कामनाओं को पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार कर देता है और जब उसकी कामनाए पूरी नही होती तो कर्म,काल व ईश्वर को दोष देता है।इसलिए जो भगवान ने हमें दिया है उसमे खुश रहकर भक्ति करना चाहिए।मां बाप और गुरू की सेवा करना चाहिए। कथा में कथा में पं हरिप्रपन्न मुनि त्रिपाठी,पं हरिओम मिश्रा,मुख्य यजमान रामदरश गुप्ता,इमराती देवी,रामकरन गुप्ता,सुभाष गुप्ता,सुनील गुप्ता,विशाल,
बृजेश गुप्ता,अमित गुप्ता,सुजीत गुप्ता,शुभम ,अंश समेत अन्य मौजूद रहे।
