बांदा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) को लागू हुए लगभग दो वर्ष हो चुके हैं। इन नए कानूनों को देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यापक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया गया था। लेकिन किसी भी कानून की वास्तविक सफलता उसकी धाराओं में नहीं, बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव और आम नागरिक, विशेषकर महिलाओं तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने में निहित होती है।
बांदा में वनांगना संस्था द्वारा आयोजित विधिक सेमिनार इसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर केंद्रित था कि नए कानून महिलाओं के जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं और न्याय की राह को कितना सुगम बना पा रहे हैं। बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा और फतेहपुर के अधिवक्ताओं का एक मंच पर आना इस बात का संकेत है कि न्याय व्यवस्था को केवल अदालतों के दायरे में नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप समझने की आवश्यकता है।लखनऊ हाईकोर्ट की अधिवक्ता अंचल गुप्ता द्वारा भरण-पोषण, घरेलू हिंसा और महिला संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों का उल्लेख इस तथ्य को रेखांकित करता है कि कानून महिलाओं को अधिकार तो देता है, लेकिन उन अधिकारों का लाभ तभी मिलता है जब उन्हें सही कानूनी मार्गदर्शन और समय पर न्यायिक सहायता उपलब्ध हो। घरेलू हिंसा अधिनियम के मामलों में डीआईआर (डोमेस्टिक इंसीडेंट रिपोर्ट) मिलने में देरी जैसी समस्याएं आज भी न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित कर रही हैं।
वास्तविकता यह है कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के अधिकांश मामलों में पीड़िता की सबसे बड़ी चुनौती कानून का अभाव नहीं, बल्कि कानून तक पहुंच का अभाव होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं अपने अधिकारों, सरकारी योजनाओं और कानूनी सुरक्षा उपायों से अनभिज्ञ हैं। ऐसे में अधिवक्ताओं और सामाजिक संस्थाओं की भूमिका केवल मुकदमे लड़ने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें जागरूकता और मार्गदर्शन का माध्यम भी बनना पड़ता है।
वनांगना संस्था की निदेशक पुष्पा शर्मा और शबीना मुमताज़ द्वारा उठाए गए मुद्दे यह स्पष्ट करते हैं कि महिला अधिकारों की लड़ाई केवल अदालतों में नहीं, बल्कि समाज के भीतर भी लड़ी जानी है। पिछले 35 वर्षों से संस्था द्वारा महिलाओं के अधिकारों और न्याय तक उनकी पहुंच के लिए किया जा रहा कार्य यह दर्शाता है कि सामाजिक संगठनों की भूमिका न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण सहयोगी बन चुकी है।सेमिनार में अधिवक्ताओं द्वारा साझा किए गए जमीनी अनुभव एक बड़ी सच्चाई सामने लाते हैं कि कानून की किताब और न्याय की वास्तविक स्थिति के बीच अभी भी एक लंबी दूरी मौजूद है। संवेदनशील मामलों में कानूनी ज्ञान के साथ मानवीय दृष्टिकोण भी उतना ही आवश्यक है। क्योंकि न्याय केवल फैसला सुनाने का नाम नहीं, बल्कि पीड़ित व्यक्ति को सम्मान और सुरक्षा का विश्वास दिलाने की प्रक्रिया भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि बीएनएस और बीएनएसएस जैसे नए कानूनों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस आधार पर किया जाए कि वे महिलाओं, कमजोर वर्गों और जरूरतमंद लोगों के जीवन में कितना वास्तविक परिवर्तन ला पा रहे हैं। कानून की शक्ति उसकी कठोरता में नहीं, बल्कि उसकी पहुंच और प्रभाव में होती है।बांदा का यह विधिक मंथन केवल एक सेमिनार नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था को अधिक मानवीय, संवेदनशील और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यदि अधिवक्ता, सामाजिक संस्थाएं और प्रशासन मिलकर कार्य करें, तो कानून की धाराएं केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में भी बदलाव का माध्यम बन सकती हैं।
