आमोद कुमार
बांदा। प्रदेश सरकार ने जिन आयुर्वेदिक दवाओं को नकली और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया, वे दवाएं आज भी बांदा के बाजारों में आसानी से मिलने के आरोपों के घेरे में हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब सरकार ने इन दवाओं के उत्पादन, परिवहन और बिक्री पर रोक लगा दी है तो आखिर इन्हें बेचने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? और औषधि प्रशासन की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां गायब है?आयुर्वेद विभाग की जांच में 32 आयुर्वेदिक दवाएं संदिग्ध पाई गई थीं। इनमें ज्वाला दाद, रूमो प्रवाही, सुंदरी कल्प सीरप, त्रयोदशांक गुग्गुल, वेदान्तक बटी, एसीन्यूट्रा लिक्विड, आंवला चूर्ण, सुपर सोनिक कैप्सूल, बोस्टा-400 टैबलेट और बायना प्लस कैप्सूल को नकली पाया गया था। वहीं कई अन्य उत्पादों में बीटामैथासोन, प्रेडनिसोलोन, डाइक्लोफेनिक, आइबुप्रोफेन, ग्लीमेपिराइड और सिल्डेनाफिल जैसी एलोपैथिक दवाओं की मिलावट मिलने की पुष्टि हुई थी।यानी मरीज आयुर्वेदिक उपचार के नाम पर ऐसी दवाओं का सेवन कर रहे थे जिनमें बिना जानकारी के स्टेरॉयड, दर्द निवारक और अन्य शक्तिशाली रासायनिक तत्व मिलाए गए थे। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रतिबंध के आदेश जारी होने के बाद भी बांदा में न तो कोई व्यापक जांच अभियान दिखाई दिया और न ही किसी मेडिकल स्टोर, थोक विक्रेता या सप्लायर के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की जानकारी सामने आई। यदि ज्वाला दाद, रूमो प्रवाही, सुंदरी कल्प सीरप, वेदान्तक बटी या अन्य प्रतिबंधित उत्पाद अब भी बाजार में उपलब्ध हैं, तो यह महज लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का संकेत है।जनता जानना चाहती है कि क्या औषधि विभाग की जिम्मेदारी केवल आदेश जारी करने तक सीमित है? यदि नहीं, तो अब तक कितनी दुकानों की जांच हुई, कितनी प्रतिबंधित दवाएं जब्त की गईं और कितने लोगों पर कार्रवाई की गई? इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है, क्योंकि मामला सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।
जब नकली और मिलावटी दवाओं के खिलाफ सरकार सख्त रुख अपनाने का दावा कर रही है, तब जमीनी स्तर पर कार्रवाई का अभाव कई आशंकाओं को जन्म देता है। खामोशी और निष्क्रियता दोनों ही संदेह को बढ़ाती हैं। ऐसे में औषधि प्रशासन को तत्काल विशेष अभियान चलाकर बाजार से ज्वाला दाद, रूमो प्रवाही, सुंदरी कल्प सीरप, त्रयोदशांक गुग्गुल, वेदान्तक बटी, एसीन्यूट्रा लिक्विड, आंवला चूर्ण, सुपर सोनिक कैप्सूल, बोस्टा-400 टैबलेट और बायना प्लस कैप्सूल जैसी प्रतिबंधित दवाओं को हटाना चाहिए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
अन्यथा जनता यह मानने को मजबूर होगी कि सरकारी प्रतिबंध केवल फाइलों और आदेशों तक सीमित हैं, जबकि जमीन पर प्रतिबंधित दवाओं का कारोबार बेखौफ जारी है। आखिर यह कारोबार किसकी नजरों के सामने चल रहा है और किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है? यह सवाल अब जवाब मांग रहा है।

