मानदेय बढ़ा, मगर संघर्ष की कहानी अभी बाकी है
आमोद कुमार
बांदा बबेरू के दुलारी गार्डन में आयोजित परिषदीय अनुदेशक कल्याण एसोसिएशन की बैठक केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि उन हजारों अनुदेशकों की वर्षों लंबी संघर्षगाथा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी थी। 17 हजार रुपये मानदेय लागू होने पर खुशी स्वाभाविक है, क्योंकि यह केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि उस संघर्ष, धैर्य और न्याय की जीत का प्रतीक है, जिसके लिए अनुदेशक वर्षों तक आवाज उठाते रहे।
तर्क यह कहता है कि शिक्षा व्यवस्था की नींव मजबूत करनी है तो शिक्षकों और अनुदेशकों को सम्मानजनक पारिश्रमिक देना ही होगा। जो व्यक्ति बच्चों के भविष्य को संवारने का दायित्व निभाता है, उसका स्वयं आर्थिक असुरक्षा में जीना किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं माना जा सकता। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और प्रदेश सरकार द्वारा उसे लागू करना शिक्षा जगत के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि केवल मानदेय वृद्धि ही अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। शिक्षा की गुणवत्ता, सेवा सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और कार्य परिस्थितियों में सुधार जैसे मुद्दे अभी भी अनुदेशकों के सामने चुनौती बने हुए हैं। इसलिए यह उपलब्धि संघर्ष के अंत की नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत है।बैठक में जिलाध्यक्ष सुशील पाण्डेय, जिला संयोजक अतुल अवस्थी, जिला महामंत्री राकेश कुमार, संरक्षक माधुरी गुप्ता और सूर्यप्रकाश सहित वक्ताओं ने जिस संगठनात्मक एकता पर बल दिया, वह इस बात का संकेत है कि अधिकारों की लड़ाई केवल अदालतों से नहीं, बल्कि संगठन की मजबूती और सामूहिक चेतना से भी जीती जाती है।बबेरू ब्लॉक अध्यक्ष के रूप में विजय करण पाल और कमासिन ब्लॉक अध्यक्ष के रूप में कमल कुमार यादव की नियुक्ति संगठन विस्तार की दिशा में एक नया कदम है। यह संदेश भी स्पष्ट है कि जब संगठन मजबूत होता है, तब आवाज केवल मांग नहीं रहती, बल्कि नीति निर्माण को प्रभावित करने वाली शक्ति बन जाती है।दरअसल, अनुदेशकों का यह संघर्ष हमें याद दिलाता है कि शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं चलती, बल्कि उन शिक्षकों के आत्मसम्मान और विश्वास से चलती है, जो सीमित संसाधनों में भी भविष्य की पीढ़ियों को गढ़ने का कार्य करते हैं।
