रिश्तों की डोर से अधिकारी एकता तक पहुंचा रक्षाबंधन
राखी सिर्फ भाई की कलाई का धागा नहीं, विश्वास, सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द का संदेश
महोली
सावन की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और रक्षा-संकल्प का पर्व है। हालांकि इसकी धार्मिक जड़ें हिंदू परंपराओं से जुड़ी हैं, लेकिन समय के साथ राखी का संदेश जाति, धर्म और समुदाय की सीमाओं से आगे बढ़कर आपसी प्रेम, भाईचारे और मानवता का प्रतीक बन गया। यही वजह है कि आज रक्षाबंधन केवल एक परिवार का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने वाला पर्व भी बन चुका है।
महाभारत से जुड़ी कृष्ण-द्रौपदी की कथा
रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग भी शामिल है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण की अंगुली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी अंगुली पर बांध दिया था। इस आत्मीयता के प्रत्युत्तर में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का संकल्प लिया। यह कथा राखी के पीछे छिपे प्रेम, विश्वास और रक्षा के भाव को रेखांकित करती है।
1905 में राखी बनी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल
रक्षाबंधन के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1905 से भी जुड़ा है। बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान कवि और राष्ट्रवादी विचारक रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में सामने रखा। बंगाल विभाजन 16 अक्टूबर 1905 को प्रभावी हुआ और इसी दौर में टैगोर ने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर भाईचारे का संदेश देने का आह्वान किया। कोलकाता, ढाका और सिलहट में हिंदू-मुस्लिम समुदाय के लोगों ने एक-दूसरे को राखी बांधी।
टैगोर का संदेश स्पष्ट था—धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत और भाईचारा एक है। इस ऐतिहासिक प्रसंग ने राखी के अर्थ को परिवार की चारदीवारी से निकालकर सामाजिक एकता और राष्ट्रीय भावना से जोड़ दिया।
आज भी प्रासंगिक है राखी का संदेश
बदलते दौर में राखी के रंग, डिजाइन और बाजार भले बदल गए हों, लेकिन इसकी मूल भावना आज भी वही है—रिश्तों में विश्वास, एक-दूसरे की चिंता और संकट में साथ खड़े रहने का संकल्प। यही कारण है कि रक्षाबंधन का पर्व सामाजिक सौहार्द का संदेश देने का भी अवसर बनता है।

