भैया दूज पर्व पर विशेष लेख
सीतापुर से – राजन तिवारी की रिपोर्ट
भैया दूज का पर्व कार्तिक शुक्ल द्वितीया (कार्तिक सुदी दूज) के दिन बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के पवित्र, प्रेमपूर्ण एवं स्नेहिल संबंध को और अधिक दृढ़ करने वाला माना जाता है।
हिंदू धर्म में यह त्योहार अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भाई-बहन के अटूट रिश्ते और उनके बीच की आत्मीयता को दर्शाता है। इस दिन भाई और बहन प्रातःकाल स्नान कर यमुना जी, गंगा जी या किसी अन्य पवित्र नदी में साथ-साथ स्नान करते हैं। मान्यता है कि यदि संभव हो तो भैया दूज के दिन भाई-बहन को एक साथ यमुना स्नान अवश्य करना चाहिए, इससे संबंधों में और अधिक मधुरता आती है।
स्नान के पश्चात बहन अपने भाई को तिलक करती है, आरती उतारती है और उसे स्वादिष्ट पकवान, मिष्ठान एवं भोजन कराती है। यह तिलक केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि बहन के मन से भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक है।
यदि किसी कारणवश भाई अपनी बहन के घर नहीं पहुंच पाता, तो बहन को स्वयं उसके घर जाकर तिलक कराना चाहिए। वहीं यदि बहन अविवाहित है और परिवार के साथ ही रहती है, तो भी भाई को स्नान कर बहन से तिलक लगवाने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
जिन लोगों की अपनी बहन नहीं होती, वे धर्म बहन, पड़ोस या रिश्तेदारी में किसी बहन समान नारी से तिलक कराकर इस शुभ पर्व की परंपरा पूरी कर सकते हैं।
भैया दूज का यह पावन त्योहार भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और कर्तव्य भावना का जीवंत प्रतीक है।
– राजन तिवारी, सीतापुर
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