बहराइच में मौत का कारोबार: शंकरपुर चौराहे पर झोलाछाप डॉक्टरों का राज, स्वास्थ्य विभाग की नींद गहरी
जहां सरकार करोड़ों खर्च कर रही है स्वास्थ्य सेवाओं पर, वहीं प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्ट मिलीभगत से झोलाछाप डॉक्टर गरीबों की जिंदगी के साथ खुला खिलवाड़ कर रहे हैं।
भूमिका और दृश्य विवरण (रायपुर कबुला–शंकरपुर चौराहा)
जनपद बहराइच के विकासखंड रिसिया व थाना क्षेत्र रिसिया में ग्राम पंचायत रायपुर कबुला के पास स्थित शंकरपुर चौराहा इन दिनों चर्चाओं में है। एक ओर सड़क किनारे चहल-पहल, दूसरी ओर छोटे-छोटे मेडिकल स्टोर, और उन्हीं के बीच एक ऐसा दृश्य जो पूरे स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोल देता है।
तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि सफेद कोट पहने एक व्यक्ति मरीज का इलाज कर रहा है। उसके पीछे दवाइयों की अलमारियां सजी हैं, और हाथ में सिरिंज लिए वह इंजेक्शन लगा रहा है। जब उससे फोन पर पूछा गया कि वह कौन है, तो उसने सहजता से उत्तर दिया —
“हाँ, मैं झोलाछाप डॉक्टर हूँ।”
यह स्वीकारोक्ति किसी व्यक्तिगत अपराध की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की असफलता की साक्षी है जो जनता की सेहत की सुरक्षा का जिम्मा उठाने का दावा करती है।
शंकरपुर चौराहा उस व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन गया है जिसमें गरीब की जान एक आंकड़ा बनकर रह गई है।
घटना का खुलासा और झोलाछाप डॉक्टर की स्वीकारोक्ति
इस पूरे मामले का केंद्र बिंदु मेडिकल स्टोर संचालक अल्ताफ सिद्दीकी है। जब अब तक टीवी न्यूज़ चैनल के पत्रकार ने मोबाइल फोन से बात की, तो उसने स्वीकार किया कि वह स्वयं झोलाछाप डॉक्टर है।
उसका यह कहना — “हाँ, मैं झोलाछाप डॉक्टर हूँ” — न केवल साहसिक, बल्कि हैरान कर देने वाला बयान है। यह दर्शाता है कि किस हद तक प्रशासनिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा खत्म हो गया है।
जहां कानून कहता है कि बिना मेडिकल डिग्री के इलाज करना अपराध है, वहीं यह व्यक्ति बेखौफ होकर अपनी पहचान स्वीकार कर रहा है।
शंकरपुर चौराहे की यह तस्वीर इस बात का सबूत है कि स्वास्थ्य विभाग की निगरानी प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।
यहाँ न तो किसी पंजीकरण की जांच होती है, न किसी मेडिकल स्टोर का सत्यापन, और न ही किसी चिकित्सक की वैधता की पुष्टि।
परिणाम यह है कि बीमार और गरीब जनता के लिए यह चौराहा “इलाज का केंद्र” नहीं, बल्कि “खतरे का चौक” बन चुका है।
स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही पर विश्लेषण
राज्य सरकार हर वर्ष करोड़ों रुपये ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने में खर्च करती है। स्वास्थ्य केंद्रों के लिए डॉक्टरों की नियुक्ति, दवाओं की खरीद, प्रशिक्षण कार्यक्रम, और जनस्वास्थ्य योजनाओं की घोषणाएँ नियमित रूप से होती रहती हैं।
लेकिन बहराइच जैसे जिले में, जहां प्रशासनिक निगरानी कमजोर है, इन योजनाओं का लाभ जनता तक नहीं पहुँच पाता।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) के अधीन आने वाले सभी चिकित्सा उपकेंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भारी कमी पाई जाती है — न डॉक्टर, न स्टाफ, न दवाएँ।
जब सरकारी अस्पतालों के दरवाजे गरीब जनता के लिए बंद हो जाते हैं, तो जनता मजबूर होकर झोलाछाप डॉक्टरों की ओर रुख करती है।
यही मजबूरी झोलाछाप डॉक्टरों की ताकत बन जाती है।
स्वास्थ्य विभाग का यह रवैया केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संवेदनहीनता की चरम सीमा है।
क्योंकि जब विभाग को मीडिया के माध्यम से अवैध क्लीनिकों की सूचना दी जाती है, तब भी कोई कार्रवाई नहीं होती।
कटघरा भगवानपुर और भोंदू चौराहे जैसे इलाकों में पहले भी झोलाछाप डॉक्टरों की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, लेकिन कार्रवाई शून्य रही।
जनता का दर्द और प्रशासन की चुप्पी
बहराइच के ग्रामीण इलाकों में लोगों की आम धारणा यह बन गई है कि “सरकारी अस्पतालों में इलाज नहीं होता, और निजी डॉक्टरों की फीस गरीब नहीं दे सकता।”
ऐसे में झोलाछाप डॉक्टर उनकी मजबूरी का फायदा उठाते हैं।
वे थोड़ी दवा, थोड़ा विश्वास और कुछ झूठे आश्वासन देकर मरीजों को इलाज के नाम पर लूटते हैं।
एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा —
“हमें नहीं पता कि कौन असली डॉक्टर है और कौन नकली। हमें तो बस दर्द से राहत चाहिए।”
यह वाक्य सुनकर प्रशासनिक व्यवस्था की नैतिक जिम्मेदारी पर प्रश्न उठता है।
क्या गरीब का जीवन इतना सस्ता हो गया है कि उसकी बीमारी अब किसी रिपोर्ट का विषय नहीं, बल्कि किसी झोलाछाप के लिए कमाई का साधन बन गई है?
जब “अब तक टीवी” के पत्रकार अदहम खान ने जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी से संपर्क साधने की कोशिश की, तो कॉल रिसीव नहीं हुई।
यह मौन, यह चुप्पी ही सबसे बड़ा उत्तर है — कि प्रशासन अब सवालों से डरता नहीं, बल्कि उनसे बचता है।
कानूनी पहलू और स्वास्थ्य नीतियों की असफलता
भारत का संविधान नागरिकों को जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार देता है।
“राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम (NMC Act)” और “इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट” के तहत बिना पंजीकरण इलाज करना अपराध है।
इसके बावजूद बहराइच में झोलाछाप डॉक्टर खुलेआम इलाज कर रहे हैं।
यह स्थिति सिर्फ कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य नीतियों की असफलता भी है।
कानून तो बना दिया गया, लेकिन उसके क्रियान्वयन की कोई ठोस प्रणाली नहीं है।
स्वास्थ्य विभाग में निगरानी समितियाँ कागजों में सक्रिय हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उनका अस्तित्व ही नहीं है।
कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो झोलाछाप डॉक्टर का इलाज किसी अपराध से कम नहीं।
यह “क्वैकरी” कहलाती है — यानी “भ्रामक चिकित्सा”।
लेकिन जब प्रशासन ही आँख मूँद ले, तो कानून सिर्फ किताबों का शब्द बनकर रह जाता है।
पत्रकारीय दृष्टिकोण और सामाजिक जिम्मेदारी
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है — जनता की आवाज बनना, सत्ता से सवाल करना और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना।
“अब तक टीवी न्यूज़ चैनल” की यह रिपोर्ट उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
अदहम खान की इस खोजी रिपोर्ट ने एक बार फिर यह साबित किया है कि मीडिया सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जनचेतना का प्रहरी है।
इस रिपोर्ट ने यह दिखाया है कि किस तरह एक फोटो, एक बयान, और एक सवाल पूरे तंत्र की नींव हिला सकता है।
पत्रकारीय दृष्टिकोण से यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि जनहित में हस्तक्षेप है —
एक ऐसा हस्तक्षेप जो समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि
“अगर पत्रकार न होते, तो झोलाछाप डॉक्टरों का यह साम्राज्य कभी उजागर नहीं होता।”
पत्रकारिता का यह प्रयास न केवल प्रशासन को आईना दिखाता है, बल्कि आम जनता को भी जागरूक करता है कि वह अपने स्वास्थ्य अधिकारों के प्रति सचेत रहे।
निष्कर्ष व जनजागरण की अपील
बहराइच की यह घटना किसी एक झोलाछाप डॉक्टर की कहानी नहीं, बल्कि उस गहरे रोग की निशानी है जो हमारे स्वास्थ्य तंत्र में फैल चुका है।
जब तक सरकार अपने चिकित्सा केंद्रों को सशक्त नहीं करती, डॉक्टरों की तैनाती नहीं करती, और निगरानी व्यवस्था को मजबूत नहीं बनाती — तब तक ऐसे झोलाछाप डॉक्टर जनता की मजबूरी बनकर फलते-फूलते रहेंगे।
आज जरूरत है कि प्रशासन त्वरित कार्रवाई करे —
शंकरपुर चौराहे और आसपास के सभी अवैध मेडिकल स्टोरों की जांच कराए।
बिना पंजीकरण वाले सभी झोलाछाप डॉक्टरों पर कानूनी कार्यवाही की जाए।
स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही पर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण — जनता को यह बताया जाए कि इलाज का अधिकार उनके जीवन का अधिकार है।
अगर यह कदम नहीं उठाए गए, तो सरकार के करोड़ों रुपये के स्वास्थ्य अभियान सिर्फ नारों में सिमटकर रह जाएंगे,
और गांवों में झोलाछाप डॉक्टर “मौत के सौदागर” बने रहेंगे।
समाज का हर जिम्मेदार व्यक्ति — चाहे वह पत्रकार हो, शिक्षक हो, या जनप्रतिनिधि — उसे इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
यह सिर्फ एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक नैतिक अपराध है।
अब तक टीवी न्यूज़ चैनल
जिला क्राइम ब्यूरो – बहराइच
रिपोर्ट: अदहम खान
