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Home मैं ऐसे समाज का निर्माण करना चाहता हूँ जहाँ मनुष्य की कीमत उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म से तय हो।

मैं ऐसे समाज का निर्माण करना चाहता हूँ जहाँ मनुष्य की कीमत उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म से तय हो।

John Doe by Rajesh Kumar Siddharth
Posted: Nov 11, 2025 10:19 AM
in न्यूज़, देश, राज्य, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, बिहार, हलचल, सियासत , हक़ीक़त, चर्चा-में
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भारत की सामाजिक संरचना हजारों वर्षों से वर्ण और जाति पर आधारित रही है। इस ढांचे में ऊँच-नीच, भेदभाव और बहिष्कार की ऐसी दीवारें खड़ी की गईं, जिन्होंने समाज को असंख्य टुकड़ों में बाँट दिया। इसी विषमता की भूमि पर जन्म लिया “दलित और बहुजन चेतना” का आंदोलन, जिसने भारतीय समाज को नए सिरे से सोचने के लिए विवश किया।

इस चेतना के महान प्रवर्तक डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था —

“मैं ऐसे समाज का निर्माण करना चाहता हूँ जहाँ मनुष्य की कीमत उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म से तय हो।”

बाबा साहब की इस वैचारिक परंपरा को बहुजन नायक कांशीराम ने आगे बढ़ाया। उन्होंने न केवल दलित शब्द को नई परिभाषा दी बल्कि “बहुजन” की अवधारणा को एक राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप दिया।

यह आलेख उसी दृष्टि से यह समझने का प्रयास है कि “दलित कौन हैं?” और “बहुजन कौन हैं?”, विशेष रूप से कांशीराम के विचारों के आलोक में।

1. दलित शब्द की उत्पत्ति और अर्थ

“दलित” शब्द संस्कृत के मूल धातु “दल” से निकला है, जिसका अर्थ है – टूटना, कुचला जाना, या दबाया हुआ व्यक्ति।

प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था ने समाज को चार वर्णों में बाँटा – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। इन चार वर्णों के बाहर जिन समुदायों को रखा गया, उन्हें “अवर्ण” कहा गया। यही वर्ग आगे चलकर “अछूत” या “अस्पृश्य” कहलाया। आधुनिक काल में इन्हीं समुदायों के लिए “दलित” शब्द का प्रयोग शुरू हुआ।

19वीं शताब्दी के सामाजिक सुधार आंदोलनों—विशेषतः महात्मा ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, और डॉ. भीमराव अंबेडकर—ने “दलित” शब्द को राजनीतिक और आत्म-सम्मान का प्रतीक बनाया।

अंबेडकर ने कहा था:

“हम दलित हैं, क्योंकि समाज ने हमें दबाया है। जब यह दबाव समाप्त होगा, तब ‘दलित’ शब्द भी समाप्त हो जाएगा।”

2. दलितों की सामाजिक स्थिति

दलितों को सदियों तक सामाजिक व्यवस्था से बाहर रखा गया।

उन्हें शिक्षा से वंचित रखा गया,

मंदिरों में प्रवेश निषिद्ध था,

पानी के कुएँ अलग थे,

और मनुष्यता का दर्जा तक उनसे छीना गया।

यह केवल सामाजिक अन्याय नहीं था, बल्कि संरचनात्मक दासता थी।
कांशीराम इस स्थिति को “ब्राह्मणवादी षड्यंत्र” कहते थे। उनके अनुसार, धर्म और संस्कृति का उपयोग सत्ता ने दलितों को गुलाम बनाए रखने के लिए किया।

3. डॉ. अंबेडकर से मिली दिशा

कांशीराम के जीवन पर डॉ. अंबेडकर का गहरा प्रभाव था।
1956 में जब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया, तो उन्होंने कहा —

“मैं हिंदू के रूप में जन्मा, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।”

कांशीराम ने इसे केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक घोषणा माना।
उनके लिए अंबेडकर का आंदोलन “दलितों को मानसिक, सामाजिक और राजनीतिक दासता से मुक्त करने का युद्ध” था।

कांशीराम ने कहा:

“अंबेडकर ने जो चेतना दी, उसे संगठित करने की जिम्मेदारी मेरी है।”

4. कांशीराम की दलित परिभाषा

कांशीराम के अनुसार,

“दलित वह नहीं जो केवल नीची जाति में जन्मा है, बल्कि वह हर व्यक्ति दलित है जिसे शोषण का शिकार बनाया गया है।”

उनके लिए “दलित” शब्द सिर्फ जातिगत नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से उत्पीड़ित वर्गों का प्रतीक था।
उन्होंने दलित शब्द का विस्तार करते हुए कहा —

“जो 15 प्रतिशत सवर्णों की सत्ता से बाहर हैं, वे सभी दलित हैं।”

इस प्रकार कांशीराम ने दलित को केवल “अस्पृश्य” या “चमार” जैसे जाति-विशेष के रूप में नहीं देखा, बल्कि समग्र उत्पीड़ित समाज का पर्याय माना।

5. बहुजन की अवधारणा

कांशीराम का सबसे महत्वपूर्ण योगदान था — “बहुजन” शब्द को सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा के केंद्र में लाना।
उन्होंने अंबेडकर की सोच को आगे बढ़ाते हुए कहा —

“हमारा लक्ष्य सिर्फ दलितों का उत्थान नहीं, बल्कि बहुजन समाज का सत्ता में भागीदारी प्राप्त करना है।”

“बहुजन” शब्द बौद्ध धर्मग्रंथों में भी मिलता है — “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” यानी बहुसंख्यक जनता के हित और सुख के लिए।

कांशीराम ने इस शब्द को आधुनिक राजनीतिक अर्थ दिया —

“भारत की 85% आबादी जो आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से वंचित है — वही बहुजन है।”

इस 85% में दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक, मजदूर, किसान और महिलाएं सम्मिलित हैं।
इसलिए उन्होंने कहा —

“दलित अकेले नहीं जीत सकते, बहुजन मिलकर ही सत्ता पा सकते हैं।”

6. दलित से बहुजन तक का सफर

कांशीराम ने दलित आंदोलन को एक सीमित पहचान से निकालकर बहुजन आंदोलन में बदला।
उन्होंने तीन मुख्य चरण तय किए:

चेतना निर्माण (Education & Awareness)

संगठन निर्माण (Organization & Unity)

राजनीतिक सशक्तिकरण (Political Power)

इन चरणों के तहत उन्होंने तीन प्रमुख संगठन बनाए —

BAMCEF (Backward and Minority Communities Employees Federation)

DS-4 (Dalit Shoshit Samaj Sangharsh Samiti)

BSP (Bahujan Samaj Party)

इन तीनों संगठनों ने मिलकर “दलित-बहुजन” आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीतिक शक्ति बना दिया।

7. कांशीराम का राजनीतिक दर्शन

कांशीराम ने कहा —

“राजनीति ही सबसे बड़ा साधन है जिससे बहुजन समाज अपनी गुलामी की जंजीरें तोड़ सकता है।”

उनका मानना था कि सत्ता से बाहर रहकर कोई समाज अपने अधिकार सुरक्षित नहीं रख सकता।
इसलिए उन्होंने दलितों से कहा —

“हम भिक्षा नहीं माँगेंगे, सत्ता छीनकर लेंगे।”

उनकी राजनीति का केंद्र सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और आत्मसम्मान था।
वे कहते थे —

“जो सत्ता में भागीदार नहीं, वह सम्मान का अधिकारी नहीं।”

8. दलित और बहुजन में अंतर

तत्वदलितबहुजन
परिभाषाऐतिहासिक रूप से शोषित, नीची जातियों के लोगसमग्र वंचित समाज – दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक
संख्यालगभग 16–17%लगभग 85%
केन्द्रबिंदुजातिगत उत्पीड़न से मुक्तिसत्ता, संसाधन और अधिकारों पर बहुसंख्यकों का नियंत्रण
आंदोलन का स्वरूपआत्मसम्मान और सामाजिक सुधारराजनीतिक-सामाजिक क्रांति
नेतृत्व का स्वरूपडॉ. अंबेडकर, ज्योतिबा फुलेकांशीराम, मायावती और बहुजन विचारधारा

इस प्रकार, “दलित” आंदोलन जहां अन्याय से मुक्ति की बात करता है, वहीं “बहुजन” आंदोलन सत्ता प्राप्ति की दिशा में बढ़ता है।
कांशीराम के शब्दों में —

“दलित मुक्ति से आगे बढ़कर बहुजन सशक्तिकरण की ओर चलो।”

9. कांशीराम का सामाजिक विश्लेषण

कांशीराम ने भारतीय समाज को तीन वर्गों में बाँटा:

शोषक (Exploiters) – जो सत्ता और संसाधनों पर कब्जा रखते हैं (लगभग 15%)

शोषित (Exploited) – जो मेहनत करते हैं पर अधिकार नहीं पाते (लगभग 85%)

निर्पेक्ष (Neutral) – जो न तो शोषक हैं, न पूरी तरह शोषित, परंतु मौन रहते हैं।

उन्होंने कहा —

“जब तक 85% जनता एकजुट नहीं होगी, 15% शोषक वर्ग शासन करता रहेगा।”

यही कारण था कि उन्होंने “बहुजन एकता” को आंदोलन का केंद्र बनाया।

10. बहुजन एकता का महत्व

कांशीराम ने कहा —

“हमारी सबसे बड़ी कमजोरी हमारी बिखराव है। जो हमें बाँटता है, वही शासन करता है।”

बहुजन एकता उनके लिए केवल राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि मानसिक और वैचारिक एकता थी।
उन्होंने जातियों के बीच कृत्रिम दीवारें तोड़ने के लिए नारा दिया —

“जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी।”

यह नारा आज भी सामाजिक न्याय की राजनीति की रीढ़ है।

11. कांशीराम का बहुजन आंदोलन

कांशीराम ने अपनी राजनीति को “बहुजन समाज पार्टी” के माध्यम से मूर्त रूप दिया।
उन्होंने 1984 में कहा —

“हमारी पार्टी गरीबों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की पार्टी है — यह बहुजनों की पार्टी है।”

उनकी राजनीति न तो केवल विरोध की थी और न केवल सत्ता की, बल्कि सत्ता के माध्यम से समाज परिवर्तन की थी।
उन्होंने कहा —

“हमारी राजनीति का उद्देश्य सत्ता में आना नहीं, बल्कि समाज बदलना है।”

12. बहुजन विचारधारा की मूल बातें

कांशीराम की बहुजन विचारधारा पाँच स्तंभों पर आधारित थी:

समानता (Equality)

संगठन (Organization)

शिक्षा (Education)

संविधानवाद (Constitutional Morality)

स्वाभिमान (Self-Respect)

उन्होंने बार-बार कहा —

“अगर बहुजन समाज शिक्षित, संगठित और आत्मविश्वासी हो गया तो कोई ताकत उसे सत्ता से दूर नहीं रख सकती।”

13. महिलाओं की भूमिका

कांशीराम का मानना था कि बहुजन आंदोलन तब तक अधूरा रहेगा जब तक महिलाएं इसमें समान रूप से भाग नहीं लेंगी।
उन्होंने कहा —

“जो समाज अपनी आधी आबादी को आगे नहीं लाता, वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता।”

इसी दृष्टिकोण से उन्होंने मायावती जैसी नेता को आगे बढ़ाया, जो आगे चलकर देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं।

14. आलोचनाएँ और चुनौतियाँ

कांशीराम की विचारधारा पर कई बार यह आरोप लगा कि वह जाति आधारित राजनीति करते हैं।
लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा —

“मैं जातिवादी नहीं, जाति-विरोधी हूँ। मेरा उद्देश्य जाति को खत्म करना है, न कि उसे मजबूत करना।”

उनकी सबसे बड़ी चुनौती थी – समाज के भीतर व्याप्त आंतरिक विभाजन, आर्थिक विषमता और जातिगत संकीर्णता।
फिर भी उन्होंने यह साबित किया कि बहुजन आंदोलन केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहारिक शक्ति भी बन सकता है।

15. कांशीराम की विरासत

कांशीराम ने एक ऐसी चेतना जगाई जिसने दलितों को “भिक्षा लेने वाले” से “अधिकार छीनने वाले” बनाया।
उनकी विरासत आज भी बहुजन समाज के हर आंदोलन की आत्मा है।
उनके विचारों से उपजा नारा —

“जो जमीन पर है, वही आसमान पर राज करेगा।”

उनकी सोच ने भारत की राजनीति को ही नहीं, समाज की दिशा को भी बदल दिया।

निष्कर्ष

कांशीराम ने “दलित” को संघर्ष का प्रतीक और “बहुजन” को सत्ता का लक्ष्य बनाया।
उनके अनुसार —

“दलित वह है जो पीड़ित है, बहुजन वह है जो एकजुट होकर मुक्ति का मार्ग चुनता है।”

उन्होंने सिखाया कि मुक्ति केवल करुणा या दया से नहीं मिलती, बल्कि संगठन, शिक्षा और संघर्ष से प्राप्त होती है।

आज जब समाज फिर से असमानताओं से जूझ रहा है, तब कांशीराम की यह शिक्षा और भी प्रासंगिक हो जाती है:

“जब बहुजन एक होगा, तब भारत में सच्चा लोकतंत्र आएगा।”

संक्षेप में:

दलित = शोषित, उत्पीड़ित, उपेक्षित वर्ग।

बहुजन = सभी दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक और वंचित वर्ग — यानी देश की 85% जनता।

कांशीराम का संदेश: “दलित से बहुजन बनो, और बहुजन बनकर सत्ता हासिल करो।”

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Siddharth
DP

Rajesh Kumar Siddharth

He is editor-in-chief at Bahujan Sangathak, Hindi dainik newspaper published from Lucknow, Uttar Pradesh (India)

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