बेंगलुरु की एक कोर्ट ने कल सोमवार को जनता दल (सेकुलर) के विधायक एचडी रेवन्ना को उनके और उनके बेटे प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ दाखिल यौन उत्पीड़न मामले से बरी कर दिया. रेवन्ना के खिलाफ मामला रद्द करने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए, कर्नाटक हाई कोर्ट ने पहले यह केस ट्रायल कोर्ट को यह विचार करने के लिए भेजा था कि शिकायत दर्ज करने में हुई 4 साल की देरी को माफ किया जा सकता है या नहीं.
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट केएन शिवकुमार ने हासन जिले के होलेनारसीपुर टाउन थाने में दर्ज केस में रेवन्ना को बरी कर दिया. अपने फैसले में मजिस्ट्रेट शिवकुमार ने कहा, “यह शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को माफ करने या आरोपी नंबर 1 के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A के तहत दंडनीय अपराध के संबंध में केस शुरू करने के लिए उपयुक्त मामला नहीं है. सीआरपीसी की धारा 473 के अनुसार, यह कोर्ट आरोपी नंबर 1 के खिलाफ IPC की धारा 354A के तहत दंडनीय उक्त अपराध का संज्ञान लेने से इनकार करती है. इस तरह से, आरोपी नंबर 1 को इस मामले में उसके खिलाफ IPC की धारा 354A के तहत लगाए गए अपराध से बरी किया जाता है.”
2019 से 2022 के बीच उत्पीड़न के आरोप
रेवन्ना और उनके बेटे प्रज्वल के खिलाफ यौन शोषण के मामले तब सामने आए जब कई महिलाओं के यौन उत्पीड़न को दर्शाने वाले 2,900 से अधिक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए. पिछले साल 2024 में केस दर्ज किया गया था.
ये आरोप हसन जिले के गन्नीकाडा में उनके फार्महाउस में काम करने वाली एक महिला की ओर से लगाए गए थे. इससे जुड़ा मामला पिछले साल 2024 की शुरुआत में होलेनारसीपुर टाउन थाने में दर्ज किया गया था. रेवन्ना के बेटे प्रज्वल पर भी इसी मामले में रेप का आरोप है और ट्रायल अभी शुरू होना बाकी है. महिला की ओर से दावा किया गया कि रेवन्ना ने 2019 और 2022 के बीच उसका यौन उत्पीड़न किया था.
28 अप्रैल को, हसन जिले के होलेनारसीपुर टाउन पुलिस स्टेशन में प्रज्वल रेवन्ना और एचडी रेवन्ना के खिलाफ IPC की धारा 354A (यौन उत्पीड़न), 354D (पीछा करना), 506 (आपराधिक धमकी), और 509 (महिला की गरिमा का अपमान) के तहत FIR दर्ज की गई थी. यह आपराधिक मामला पीड़ितों में से एक द्वारा दायर शिकायत पर दर्ज किया गया था.
हालांकि एचडी रेवन्ना को 2 आपराधिक मामलों का सामना करना पड़ा. उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न करने के आरोप लगे और फिर और अपहरण के भी आरोप लगे. उन्हें 13 मई को दोनों मामलों में जमानत मिल गई थी.
हाई कोर्ट में रेवन्ना ने क्या कहा था
हाई कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में, रेवन्ना ने यह तर्क दिया था कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure) की धारा 468 के तहत रोक को देखते हुए ट्रायल कोर्ट अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता. उस प्रावधान में कहा गया है कि एक से तीन साल की कैद से दंडनीय अपराधों के लिए, सीमा अवधि 3 साल है. हालांकि, CrPC की धारा 473 में कहा गया है कि कोई भी कोर्ट लिमिटेशन की अवधि खत्म होने के बाद भी किसी अपराध का संज्ञान ले सकता है, अगर उसे लगता है कि देरी की सही वजह बताई गई है.
इस पर हाई कोर्ट ने कहा था, “क्योंकि IPC की धारा 354A के तहत अधिकतम सजा 3 साल की है, इसलिए यह देखना जरूरी है कि CrPC की धारा 473 के अनुसार लिमिटेशन की अवधि बढ़ाने के लिए यह सही मामला है या नहीं.” फिर इसे देखते हुए, हाई कोर्ट ने मामले को ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया ताकि वह नए सिरे से विचार करे कि देरी को माफ करने के लिए यह सही मामला है या नहीं.

