कानून मशीनों के साथ, इंसाफ गरीब के खिलाफ?” — बालू खनन में सिस्टम की चुप्पी पर यमुना किनारे उठता विद्रोही सवाल
लालापुर,प्रयागराज। यमुनानगर क्षेत्र की बारा तहसील का सेमरी तरहार आज किसी खनन स्थल से ज़्यादा गरीबों की टूटी उम्मीदों का मैदान बन चुका है। यमुना किनारे खड़े मल्लाहों की नावें चुपचाप पानी में झूल रही हैं—जैसे पूछ रही हों कि क्या अब मेहनत की कोई कीमत नहीं रही? क्या इस देश में सिर्फ मशीनें ही काम करेंगी और इंसान बेरोजगार होकर भूखे मरेंगे।रविवार को खनन इंस्पेक्टर वैभव सोनी और अन्य अधिकारी पहुंचे। जांच हुई—या जांच के नाम पर झोलझपटा या यूं कहें खानापूर्ति। अधिकारी आए, काग़ज़ों में टिक लगाया और चले गए। स्थानीय लोगों का आरोप है कि असली खनन माफिया को छूने की हिम्मत किसी में नहीं, इसलिए कार्रवाई का सारा बोझ गरीब मल्लाह-मांझियों पर डाल दिया जाता है। मल्लाह समाज की पीड़ा सिर्फ पेट की नहीं, आत्मसम्मान की भी है। वे कहते हैं—“हम चोरी नहीं करते, हम मेहनत करते हैं। नाव हमारी पहचान है, पानी हमारा जीवन। अगर नाव से बालू निकालना गुनाह है, तो फिर मशीनों से दिन-रात करोड़ों की लूट क्या है?”ग्रामीणों का सवाल सीधा है—क्या कानून सिर्फ कमजोर के लिए बना है? पोकलैंड और जेसीबी खुलेआम यमुना का सीना चीर रही हैं। रात-दिन बालू निकल रही है, ट्रक दौड़ रहे हैं, लेकिन प्रशासन की आंखों पर जैसे पट्टी बंधी हो। वहीं दूसरी तरफ नाव से बालू निकालने वाले गरीब को अपराधी बना दिया जाता है,चालान होता है, धमकाया जाता है। इस लड़ाई में सबसे ज़्यादा चोट गरीब के बच्चों पर पड़ रही है। अधिकारी अपने बच्चों को महंगे स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, जबकि मल्लाहों के बच्चे आज भी सरकारी स्कूल तक पहुंचने के लिए जूझ रहे हैं। सवाल उठता है— क्या गरीब के बच्चे पढ़ने के हकदार नहीं हैं? स्थानीय लोगों का कहना है कि बेरोजगारी ने पूरे इलाके को अंदर से खोखला कर दिया है। जब काम छीना जाएगा, तो मजबूरी अपराध को जन्म देगी। चोरी बढ़ेगी, विवाद बढ़ेंगे—और तब भी आरोपी गरीब ही बनेगा। असली गुनहगार सिस्टम की गोद में सुरक्षित रहेंगे। ग्रामीण सात– आठ साल पुराने दिनों को याद करते हैं, जब बालू निकासी नाव और मजदूरों से होती थी। तब न बालू महंगी थी,न इलाके में इतनी अराजकता। हर हाथ को काम था—मल्लाह, मजदूर, ट्रांसपोर्टर और आम आदमी। लेकिन जैसे-जैसे नीतियां बदलीं, वैसे-वैसे गरीबी को हाशिये से धक्का देकर भूख की लाइन में खड़ा कर दिया गया। आज हालात यह हैं कि बालू आम आदमी की पहुंच से बाहर हो चुकी है। लोग कहते हैं— “बालू अब जरूरत नहीं, लग्ज़री बन गई है।”एक तरफ गरीब एक बोरी बालू के लिए तरस रहा है, दूसरी तरफ कुछ लोग मशीनों के सहारे करोड़ों कमा रहे हैं। यह कैसा विकास है, जिसमें गरीब की रोटी छिन जाए?—मल्लाह- मांझियों की मांग बहुत साफ है—पोकलैंड और जेसीबी से बालू लोडिंग पर तत्काल रोक लगे। नाव और मजदूर आधारित बालू निकासी को कानूनी संरक्षण मिले। गरीबों को अपराधी नहीं, व्यवस्था का साझेदार बनाया जाए। यह कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि यमुना किनारे बसे उन लोगों की चीख है, जिनका जीवन नदी, नाव और मेहनत से जुड़ा है। सेमरी तरहार में आज लड़ाई बालू की नहीं, गरीब के हक, सम्मान और इंसाफ की है। अगर सरकार और प्रशासन ने इस आवाज़ को आज नहीं सुना, तो कल इसकी गूंज सिर्फ यमुना किनारे नहीं, पूरे समाज में सुनाई
