पीपा पुल आया, उम्मीद जगी… फिर सवाल वही—कब बनेगा स्थायी पुल?
लालापुर, प्रयागराज। सुबह की पहली किरण के साथ जब प्रतापपुर घाट पर पीपा पुल से पहला कदम रखा गया, तो सिर्फ एक पुल नहीं खुला—बल्कि वर्षों से इंतजार कर रहे ग्रामीणों की उम्मीदें भी जाग उठीं।यमुनानगर क्षेत्र के बारा तहसील अंतर्गत थाना लालापुर के प्रतापपुर घाट पर पीपा पुल के चालू होते ही लोगों के चेहरों पर राहत साफ झलकने लगी। अब स्कूल जाने वाले बच्चों को नाव का डर नहीं, बीमार को अस्पताल ले जाने में जान की बाज़ी नहीं, किसान को खेत तक पहुंचने में घंटों का इंतज़ार नहीं। चार महीनों के लिए ही सही, लेकिन ज़िंदगी थोड़ी आसान जरूर हो गई है। मगर यही राहत अपने साथ एक कड़वा सच भी लेकर आई है। यह पुल सिर्फ चार महीने का मेहमान है। चार महीने बाद पीपा पुल हटेगा और फिर वही पुरानी कहानी—नाव, जोखिम, इंतजार और बेबसी। ग्रामीणों की ज़िंदगी हर साल इसी अस्थायी इंतज़ाम के भरोसे चलती है। बरसात आते ही नदी उफान पर होती है, नावें बंद होती हैं, रास्ते टूट जाते हैं और पूरा इलाका जैसे प्रशासन से कट जाता है। किसान अपनी उपज नहीं निकाल पाते, मज़दूर काम पर नहीं पहुंच पाते और गर्भवती महिलाओं से लेकर बुज़ुर्गों तक को भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। स्थानीय लोगों का सवाल सीधा और दर्द भरा है—“जब हर साल पीपा पुल बन सकता है, तो एक बार पक्का पुल क्यों नहीं?”ग्रामीणों का कहना है कि प्रतापपुर घाट पर यदि स्थायी पुल बन जाए, तो यह सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और विकास का दरवाज़ा होगा। चार महीने की राहत नहीं,बल्कि बारह महीने का भरोसा मिलेगा। आज पीपा पुल चालू हुआ है, लोग खुश हैं, लेकिन खुशी के बीच चिंता भी है—क्योंकि यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती…चार महीने बाद यही पुल हटेगा और प्रतापपुर घाट फिर उसी सवाल के साथ खड़ा होगा—राहत अस्थायी क्यों, विकास स्थायी कब?
