सम्मान नहीं, चेतावनी भी: विधायक के मंच से हुंकार—“छुपाओ मत, इलाज कराओ… हर गांव को टीबी मुक्त बनाओ”
जसरा,प्रयागराज। कभी खामोशी में पनपने वाली और जानलेवा बन जाने वाली बीमारी टीबी के खिलाफ अब गांव खुद मोर्चा संभाल रहे हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जसरा अंतर्गत पांच ग्रामसभाओं ने न सिर्फ इस बीमारी को हराया, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक मजबूत उदाहरण भी पेश कर दिया। बृहस्पतिवार को हुए सम्मान समारोह में बारा विधायक डॉ. वाचस्पति ने इन ग्रामसभाओं के प्रधानों को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया, लेकिन इस मंच से सिर्फ तालियां नहीं बजीं—एक सख्त संदेश भी गया। ओझा पट्टी, रेही तालुका, गड़ैया कला, भिस्कुरी और खूझी—ये पांचों ग्रामसभाएं अब “टीबी मुक्त” घोषित हो चुकी हैं। यहां के प्रधानों—भूपेश कुमार सिंह, सुरेन्द्र कुमार, शान्ति कुरील, सुनीता देवी और आशीष कुमार पाल—को सम्मानित करते हुए विधायक ने साफ कहा कि यह उपलब्धि जितनी बड़ी है, जिम्मेदारी उससे कहीं ज्यादा बड़ी है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा—“टीबी छुपाने की बीमारी नहीं है, यह बताने और इलाज कराने की बीमारी है। एक मरीज की लापरवाही पूरे गांव को खतरे में डाल सकती है।” उनके इस बयान ने कार्यक्रम को सिर्फ औपचारिकता नहीं रहने दिया, बल्कि इसे जनचेतना का मंच बना दिया। विधायक ने सभी ग्रामप्रधानों और नागरिकों से अपील की कि वे टीबी उन्मूलन अभियान को आंदोलन की तरह लें। गांव-गांव निगरानी, समय पर जांच और नियमित दवा—इन्हीं तीन हथियारों से इस बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सकता है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि इस लड़ाई में संसाधनों और सहयोग की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। कार्यक्रम में सीएचसी अधीक्षक डॉ. अंकिता पांडेय ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग लगातार सक्रिय है और हर संभावित मरीज तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि “टीबी के खिलाफ जंग अब अंतिम चरण में है, बस समाज का पूरा सहयोग जरूरी है।” उन्होंने ब्लॉक कार्यक्रम प्रबंधक पंकज मिश्रा, डॉ. सुरेश प्रसाद और डॉ. उदय राज समेत पूरी टीम की मेहनत को इस सफलता का आधार बताया। कार्यक्रम में मौजूद जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या इस बात का संकेत थी कि यह अभियान अब सिर्फ सरकारी योजना नहीं, बल्कि जनआंदोलन बनता जा रहा है। भाजपा मंडल अध्यक्ष जगत नारायण शुक्ल, जिला मीडिया प्रभारी दिलीप कुमार चतुर्वेदी, विधायक प्रतिनिधि विजय निषाद, फूलचंद पटेल, नीरज केसरवानी सहित कई प्रमुख लोग मौजूद रहे। संदेश साफ है: जसरा ने रास्ता दिखा दिया है—अगर जागरूकता, जिम्मेदारी और सिस्टम साथ आएं, तो टीबी जैसी गंभीर बीमारी को भी गांव की सीमा से बाहर किया जा सकता है। अब सवाल यह है—बाकी गांव कब जागेंगे?
