बांदा के ग्राम पंचायत मुरवल, थाना बबेरू का मामला केवल मारपीट या विवाद भर नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है जिसका पहला दायित्व पीड़ित को तत्काल सुरक्षा और न्याय देना होता है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि 7 मई 2026 की रात लगभग 11 बजे लालमन, मांजर, कलुवा और विनोद द्वारा धारदार हथियारों से हमला किया गया, जिसमें संजय, बाबू, चंदू और कमल गंभीर रूप से घायल हो गए। इतना ही नहीं, महिलाओं के साथ अभद्रता और कपड़े फाड़ने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं।
घटना के बाद पीड़ितों ने तत्काल 112 नंबर पर फोन कर पुलिस सहायता मांगी। आरोप है कि पुलिस मौके पर पहुंची, पूछताछ की और फिर थाने आने की बात कहकर लौट गई। रात में घायल अवस्था में थाने पहुंचे पीड़ितों को यह कहकर वापस भेज दिया गया कि पहले इलाज करवा लो, उसके बाद मुकदमा लिखा जाएगा। सवाल यह उठता है कि क्या गंभीर रूप से घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाना पुलिस की जिम्मेदारी नहीं थी? क्या रात में मदद मांगने वाले नागरिकों को केवल औपचारिक सलाह देकर छोड़ देना संवेदनशील पुलिसिंग कहलाएगा?पीड़ितों के अनुसार उन्हें स्वयं अस्पताल जाना पड़ा, जहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र से जिला अस्पताल रेफर किया गया। गंभीर चोटों के कारण बाबू और संजय के टांके तक लगाए गए। इसके बावजूद शिकायत है कि पुलिस ने पीड़ितों के प्रार्थना पत्र के अनुरूप मुकदमा दर्ज नहीं किया और मनमाने तरीके से धाराएं लगाईं।यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अक्सर पुलिस प्रशासन “संवेदनशील पुलिसिंग” और “तत्काल न्याय” के दावे करता है। लेकिन यदि घायल और खून से लथपथ लोग भी अपनी पीड़ा साबित करने के लिए संघर्ष करें, तो आमजन का भरोसा व्यवस्था से कमजोर होना स्वाभाविक है।
जब इस संबंध में Banda Police के बबेरू प्रभारी निरीक्षक से बात की गई तो उनका कहना था कि विवेचना के बाद धाराएं बढ़ा दी जाएंगी। किंतु प्रश्न केवल धाराएं बढ़ाने का नहीं है, बल्कि उस शुरुआती संवेदनशीलता का है जिसकी अपेक्षा हर पीड़ित नागरिक पुलिस से करता है।कानून का उद्देश्य केवल मुकदमा दर्ज करना नहीं, बल्कि पीड़ित को यह विश्वास दिलाना भी है कि वह अकेला नहीं है। यदि शिकायतकर्ता को न्याय पाने के लिए ही संघर्ष करना पड़े, तो यह स्थिति व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाती है।
