आमोद कुमार
जनपद बांदा में बहने वाली केन नदी इन दिनों केवल जलधारा नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता की साक्षी बन चुकी है। गिरवां थाना क्षेत्र के बहादुरपुर स्योढ़ा बालू खंड में जिस तरह प्रतिबंधित लिफ्टर मशीनों से नदी का सीना चीरा जा रहा है, वह केवल अवैध खनन नहीं, बल्कि प्रकृति के विरुद्ध खुला अपराध प्रतीत होता है।जिस नदी ने वर्षों से बुंदेलखंड की प्यास बुझाई, खेतों को जीवन दिया और जीव-जंतुओं को आश्रय दिया, आज वही नदी मशीनों के शोर में कराह रही है। केन की शांत लहरों के नीचे रहने वाले जलीय जीव मौत के मुंह में समा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार तंत्र की आंखों पर मानो स्वार्थ की पट्टी बंधी हुई है।विडंबना यह है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के नियम किताबों तक सीमित होकर रह गए हैं। जमीन पर नियमों की जगह रसूख, संरक्षण और अवैध कमाई का तंत्र दिखाई देता है। सवाल यह है कि जब प्रतिबंधित मशीनों से खुलेआम खनन हो रहा है, तो क्या प्रशासन को इसकी भनक नहीं? या फिर यह वही “मौन सहमति” है, जिसमें राजस्व से ज्यादा महत्व अवैध कमाई को मिल जाता है।सूत्र बताते हैं कि कुछ कथित लोगों की निगरानी में यह पूरा खेल संचालित हो रहा है और बंद पड़े रिसौरा खंड से भी चोरी-छिपे बालू निकाली जा रही है। यदि यह सच है, तो यह केवल खनिज संपदा की चोरी नहीं, बल्कि सरकार की व्यवस्था और कानून दोनों को खुली चुनौती है।बालू माफिया के बुलंद हौसले इस बात का प्रमाण हैं कि उन्हें किसी कार्रवाई का भय नहीं। शायद इसलिए क्योंकि उन्हें पता है कि नदी की चीखें फाइलों तक नहीं पहुंचतीं। लेकिन याद रखना होगा कि प्रकृति हर अत्याचार का हिसाब रखती है। जब नदियां सूखती हैं, तब केवल पानी नहीं खत्म होता, सभ्यताओं का संतुलन भी टूट जाता है।आज आवश्यकता केवल कार्रवाई की नहीं, बल्कि उस सोच को बदलने की है जिसमें विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश स्वीकार्य बना दिया गया है। वरना आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि आखिर कुछ ट्रकों की बालू के लिए हमने अपनी नदियों को क्यों मरने दिया।
