गैंलेंट-अंकुर उद्योग ने रोजगार तो दिया, पर
हवा-जमीन-जल सबको कर दिया जहरीला; सरकार-जनप्रतिनिधि मौन
गोरखपुर, सहजनवा थाना सहजनवा, तहसील सहजनवा क्षेत्र में गैंलेंट और अंकुर उद्योग जैसी बड़ी कंपनियां एक तरफ रोजगार का वरदान लेकर आईं, तो दूसरी तरफ प्रदूषण का ऐसा अभिशाप दे गईं जिसे सहजनवा की 3.5 लाख से ज्यादा आबादी हर सांस के साथ झेलने को मजबूर है।
सहजनवा के लोगों की दिनचर्या अब प्रदूषण के साथ ढल गई है। सुबह उठते ही हवा में घुली धूल, शाम को फैक्ट्री से निकलता धुआं और रात में गंदा पानी... यह सब अब यहां की नई व्यवस्था बन चुकी है। लोग मजबूरी में इसी माहौल में जीने की आदत डाल चुके हैं, लेकिन उनकी उम्र धीरे-धीरे कम हो रही है। डॉक्टरों का कहना है कि क्षेत्र में सांस, त्वचा और आंखों की बीमारियों के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं।विशेषज्ञों की राय है कि इतनी बड़ी आबादी वाले क्षेत्र से कम से कम 2 किलोमीटर दूर औद्योगिक इकाइयां स्थापित की जानी चाहिए थीं, ताकि प्रदूषण का असर कम हो। लेकिन सहजनवा में कंपनियां आबादी के बीचों-बीच लग गईं। सरकार और संबंधित विभागों ने इस अहम बिंदु को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। नतीजा ये कि आज सहजनवा की हवा में घुला जहर हर घर तक पहुंच रहा है।स्थानीय जनप्रतिनिधि कंपनियों के आने को सरकार की उपलब्धि बताकर श्रेय लेने में लगे हैं, लेकिन प्रदूषण रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। कोटा बढ़ाने, उत्पादन बढ़ाने की बातें तो खूब होती हैं, पर फिल्टर लगाने, ईटीपी चलाने और हरियाली बढ़ाने पर कोई ध्यान नहीं। जनता पूछ रही है कि रोजगार के नाम पर मिली मौत की खुराक कब तक सहनी पड़ेगी?
स्थानीय नागरिकों का दर्द साफ झलकता है प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाओगे तो कहेंगे विकास विरोधी हो। अपशिष्टजल, पानी पियो, गंदी हवा में सांस लो... पर याद रखो, कॉकरोच की तरह जीना प्रदूषण नहीं रोक पाएगा। उनका कहना है कि जब तक सरकार और प्रशासन आंखें नहीं खोलेगा, सहजनवा की नई पीढ़ी बीमारियों की गिरफ्त में सिसकती रहेगी।
लोगों की मांग है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तुरंत सख्ती करे। कंपनियों में लगे प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों की निष्पक्ष जांच हो,२४×७ मॉनिटरिंग हो और मानकों का उल्लंघन करने पर कड़ी कार्रवाई हो। सहजनवा को औद्योगिक हब जरूर बनाओ, पर गैस चैंबर मत बनाओ।सरकार से सवाल है - विकास का मतलब क्या सिर्फ फैक्ट्री की चिमनी है, या उस चिमनी के नीचे सांस ले रहे इंसानों की जिंदगी भी?

