आमोद कुमार,
बांदा।बुंदेलखंड की तपती धरती पर खनन केवल बालू और पत्थर निकालने का काम नहीं रह गया है, बल्कि कई बार यह ताकत, दबंगई और कानून को चुनौती देने का मैदान भी बन जाता है। गिरवा थाना क्षेत्र की बहादुरपुर-श्योढ़ा खदान से सामने आया ताजा मामला ऐसे ही कई असहज सवाल खड़े कर रहा है, जिनका जवाब पुलिस और प्रशासन को देना होगा।
ग्राम सेमरी धाम निवासी खदान कर्मचारी अर्पित सिंह पुत्र देवेंद्र सिंह ने आरोप लगाया है कि 13 जून की दोपहर लगभग 1:30 बजे खदान संख्या 300/316 में ड्यूटी के दौरान अभिनव सिंह, जीतू सिंह, शुभम, अनिल कुमार, राकेश, राजू तथा उनके अन्य साथियों ने खदान में पहुंचकर दबाव बनाया कि उनकी गाड़ी बिना रॉयल्टी और भुगतान के लोड की जाए। पीड़ित के अनुसार जब उसने इसका विरोध किया तो विवाद बढ़ गया और उसके साथ कथित रूप से लाठी-डंडों तथा लोहे की रॉड से मारपीट की गई।अर्पित सिंह का आरोप है कि हमले में उसे गंभीर चोटें आईं और मारपीट के दौरान उसकी सोने की चेन तथा करीब एक लाख रुपये नकद भी छीन लिए गए। घटना के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां मेडिकल परीक्षण कराया गया। पीड़ित का दावा है कि पूरी घटना खदान में लगे सीसीटीवी कैमरों में रिकॉर्ड हुई है तथा मोबाइल फोन पर मिली धमकियों के साक्ष्य भी उसके पास मौजूद हैं।यदि पीड़ित के आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल एक कर्मचारी पर हमला नहीं, बल्कि उस कानून व्यवस्था को खुली चुनौती है जो खनन क्षेत्र में नियमों और राजस्व व्यवस्था को लागू करने का दावा करती है। सवाल यह है कि क्या अब खदानों में नियमों की जगह दबंगों की शर्तें चलेंगी? क्या सरकारी रॉयल्टी और वैधानिक प्रक्रिया से ऊपर कुछ लोगों की मनमर्जी खड़ी हो गई है?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब पीड़ित मेडिकल परीक्षण, सीसीटीवी फुटेज और धमकियों के कथित साक्ष्य होने की बात कह रहा है, तब अब तक मुकदमा दर्ज न होने की चर्चा क्यों हो रही है? सोशल मीडिया पर घटना का वीडियो वायरल होने के बाद भी यदि कार्रवाई स्पष्ट दिखाई नहीं देती, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में संदेह पैदा होता है।
कानून की ताकत उसकी निष्पक्षता और त्वरित कार्रवाई में होती है। लेकिन जब घायल व्यक्ति न्याय की गुहार लगा रहा हो और प्रशासनिक मशीनरी की ओर से ठोस कार्रवाई की तस्वीर सामने न आए, तब यह स्थिति आम नागरिक के विश्वास को कमजोर करती है। यह सवाल केवल अर्पित सिंह का नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति का है जो यह भरोसा रखता है कि कानून सबके लिए बराबर है।हालांकि न्याय का तकाजा यह भी है कि किसी को दोषी ठहराने से पहले पुलिस निष्पक्ष जांच करे और सभी पक्षों की बात सुने। लेकिन निष्पक्ष जांच का अर्थ निष्क्रियता नहीं होता। यदि आरोप झूठे हैं तो सच्चाई सामने आनी चाहिए और यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो कानून के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत करे।अब निगाहें गिरवा थाना पुलिस और जिला प्रशासन पर हैं। जनता यह जानना चाहती है कि वायरल वीडियो, मेडिकल परीक्षण और कथित साक्ष्यों के बीच सच्चाई क्या है और न्याय की प्रक्रिया आखिर किस दिशा में बढ़ रही है।क्योंकि जब खदान में लाठियां बोलें, वीडियो गवाही दे और व्यवस्था खामोश दिखाई दे, तब सवाल केवल एक घटना पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर उठते हैं।

