आमोद कुमार
बांदा। अगर एक वायरल वीडियो में तारीख दिख रही है, समय दर्ज है, GPS लोकेशन अंकित है और केन नदी के किनारे ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से बालू भरते दृश्य साफ दिखाई दे रहे हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि वीडियो वायरल क्यों हुआ, बल्कि यह है कि क्या प्रशासन की आंखें सोशल मीडिया के बाद खुलती हैं?
मतौंध थाना क्षेत्र के मारौली इलाके से सामने आए इस वीडियो ने एक बार फिर उस पुराने जख्म को कुरेद दिया है, जिसे बुंदेलखंड के लोग वर्षों से देखते आ रहे हैं। केन नदी, जो इस क्षेत्र की जीवनरेखा है, उसकी छाती से यदि खुलेआम बालू निकाली जा रही है, तो यह केवल अवैध खनन का मामला नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के सरकारी दावों पर भी सवालिया निशान है। अवैध खनन कोई जेब में रखी जाने वाली चीज नहीं है। इसके लिए ट्रैक्टर चाहिए, मजदूर चाहिए, रास्ते चाहिए और सबसे बढ़कर चाहिए—एक ऐसा माहौल, जहां कानून का डर कम और मुनाफे का भरोसा ज्यादा हो। यदि ग्रामीणों के आरोप सही हैं कि उजरेहटा गांव के आसपास से बिना रॉयल्टी बालू निकालकर मौदहा तक पहुंचाई जा रही है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर निगरानी की पूरी व्यवस्था किस काम की है?
विडंबना देखिए, एक ओर प्रशासन हीट वेव से निपटने के लिए वैज्ञानिकों को बुला रहा है, पौधरोपण की योजनाएं बना रहा है, पर्यावरण संरक्षण की बातें कर रहा है, और दूसरी ओर यदि नदियों की प्राकृतिक संरचना को ही क्षति पहुंच रही हो, तो यह ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति छत की मरम्मत करे और नींव को खोखला होने दे।
केन नदी आज किसी लाचार मां की तरह है, जिसकी गोद से उसकी धरोहर छीनी जा रही है और वह मौन होकर यह सब देख रही है। उसकी रेत केवल निर्माण सामग्री नहीं है, बल्कि उसके अस्तित्व का आधार है। रेत हटेगी तो किनारे कटेंगे, किनारे कटेंगे तो जलधारा बदलेगी और जलधारा बदलेगी तो आने वाली पीढ़ियां प्यास और संकट दोनों विरासत में पाएंगी।लेकिन इस पूरे मामले में एक और सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि अभी संबंधित विभागों द्वारा नहीं की गई है। इसलिए जांच निष्पक्ष होनी चाहिए। यदि वीडियो और आरोप सही हैं तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, और यदि गलत हैं तो सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए।
मगर सवाल फिर भी रहेगा—
क्या केन नदी की सुरक्षा केवल फाइलों में लिखी जिम्मेदारी है? क्या नदियों की रक्षा के लिए कानून सिर्फ कागजों पर है? और क्या हर बार सोशल मीडिया ही प्रशासन की आंखें खोलेगा?क्योंकि इतिहास गवाह है—जब नदियां लूटी जाती हैं, तो केवल रेत नहीं जाती, एक सभ्यता का भविष्य भी धीरे-धीरे बहने लगता है।और तब सबसे कठघरे में खड़ा होता है—
