आमोद कुमार
बांदा। मुहर्रम केवल शोक और स्मरण का पर्व नहीं, बल्कि इंसानियत, त्याग और भाईचारे की वह रोशनी है, जो समाज को एकता के सूत्र में बांधती है। इसी संदेश को साकार करते हुए हुसैनी 72 वेलफेयर सोसायटी ने मुहर्रम के अवसर पर शहर में सबील का आयोजन कर राहगीरों और आम नागरिकों को शरबत एवं ठंडा पानी वितरित किया।इस अवसर पर हिंदू, मुस्लिम, शिया और सुन्नी सभी समुदायों के लोगों ने एक साथ शरबत ग्रहण किया। यह दृश्य केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि उस गंगा-जमुनी तहजीब की जीवंत तस्वीर था, जिसकी पहचान सदियों से भारत की सामाजिक संस्कृति रही है।
सोसायटी के पदाधिकारियों ने बताया कि यह सबील हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) की याद में लगाई गई है, जिनका जीवन अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, सत्य के पक्ष में बलिदान और मानवता की सेवा का प्रतीक है। उनका संदेश किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है।
कर्बला की प्यास आज भी इंसानियत को यह सिखाती है कि धर्म की सबसे बड़ी पहचान सेवा है और इंसान की सबसे बड़ी पहचान इंसानियत। जब एक ही सबील पर अलग-अलग धर्मों और विचारों के लोग एक साथ खड़े होकर प्रेम का शरबत पीते हैं, तब समाज में फैली दूरियां स्वतः कम होने लगती हैं।
इस आयोजन को सफल बनाने में डॉ. शोएब नियाज़ी उर्फ शिबू भाई, अरशद निजामी, राजेश दीक्षित एडवोकेट, इदरीस खान, निजामुद्दीन फारूकी, आरिफ निजामी, सीमा खान, आरिफ नियाज़ी, अतीक अली, फरहान, हमज़ा, फैज़ान रब्बानी, लब्बैक रब्बानी, आसिफ अली, अली सादात खान, अफनान हुसैन, शोएब रिजवी, दानिश मजीद, दानिश नियाज़ी, समीर अहमद और साकिब अहमद का विशेष सहयोग रहा।हुसैनी 72 वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद साद हुसैन ने सभी सहयोगियों और नगरवासियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि "इमाम हुसैन (अ.स.) की शिक्षा न्याय, त्याग, इंसानियत और भाईचारे का संदेश देती है। इन मूल्यों को समाज के हर व्यक्ति तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।"आज जब समाज को जोड़ने वाले प्रयासों की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, ऐसे में यह सबील केवल शरबत बांटने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मोहब्बत, आपसी सम्मान और कौमी एकता का वह पैगाम है, जो बताता है कि इंसानियत से बड़ा कोई मजहब नहीं होता।
