अर्जुन रौतेला आगरा। आगरा के वरिष्ठ एवं कनिष्ठ कवियों ने जमकर साहित्य रस की वर्षा की, माधुर्य संस्था जिसकी संस्थापक अध्यक्ष निशिराज जो स्वयं एक कवयित्री, गायिका एवं शिक्षिका है.. और संस्था के कोषाध्यक्ष के रूप में उनके पति राजकुमार जैन के द्वारा किए गए निस्वार्थ प्रयत्नों से 7 वर्ष पूर्व प्रारंभ की गई सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त यह संस्था जिसे किसी प्रकार का कोई आर्थिक सहयोग नहीं है... निरंतर नित नए आयाम रच रही है। हर वर्ष किसी न किसी नवोदित कवि अथवा लेखक की पुस्तक का लोकार्पण हो अथवा युवा कलाकारों को मंच प्रदान करना । यही सेवा भाव एवं उद्देश्य इस संस्था का है। संस्कृति की सेवा राष्ट्र की सेवा ही मेरा उद्देश्य है यह कहना है संस्था अध्यक्ष निशिराज का। इसी क्रम में नव वर्ष के शुभागमन का स्वागत करते हुए माधुर्य कार्यालय पर एक साहित्यिक संध्या का आयोजन किया गया। जिसमें शहर भर के कवियों ने अपनी अपनी रचनाएं सुना कर श्रोताओं का दिल जीत दिया। निशि राज ने जब अपना प्रेरक गीत "घना कोहरा जो छाया है छटेगा एक दिन ए दोस्त.. कि इस कोहरे के पीछे हैं प्रकाशित सूर्य कितने ही... सुनाया तो श्रोता तालियां बजाने पर मजबूर हो गए । गीतकार कुमार ललित के "प्रिय तुम्हारे दर्शनों को हम तरसते रह गए.. तुम कहां जाने कहां बरसते रह गए" गीत पर श्रोत वाह वाह कर उठे। डॉक्टर केशव शर्मा ने सुनाया ..छोटी सखियां खेली जो संग बचपन छूट गया ..लगे वह कोई सपना सा जो अब टूट गया... डॉक्टर मिलन ने कहा "लेकर आया नया संदेश जीवन का उत्कर्ष उथल-पुथल के गलियारों से गुजर गया गतवर्ष"... रमा वर्मा श्याम ने लोकगीत सुनाया.. काम ही करवाए ले दऊ नौकरी छोड़... कांची सिंघल ओस ने गीत पढ़ा "दूर जाने की बात करते हो दिल जलाने की बात करते हो"
ब्रज गीतकार बृज बिहारी लाल बिरजू ने सुनाया "द्वार की देहरी पर खड़ी तुम प्रिय जाऊं तो मुस्कुरा कर निहारा करो । यशोयश ने सुनाया "श्याम सलोना सांवरो नीकू लगे बावरा" श्रुति सिन्हा ने नव वर्ष की मधुर शुभकामनाएं दी । इसके साथ ही महेश शर्मा गोपाली ने श्याम का आह्वान किया। सुधा वर्मा ने प्रेरक कविता सुनाई तो राम अवतार जी ने लोकगीत से सब का मन जीत लिया। डॉ. शशी गुप्ता ने भी इसी क्रम में सुंदर लोकगीत सुनाया। इसके अतिरिक्त इंदल सिंह इंदु, रामेंद्र शर्मा, आदर्श नंदन गुप्त, आचार्य उमाशंकर, दीपक श्रीवास्तव एवं नन्द नंदन की उपस्थिति और रचनाओं को सभी ने हृदय से सराहा।
सभी का एकमत था कि इस तरह की काव्य गोष्ठियां राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देतीं है ।

